स्याह मोती उजले पन्नों पर ...
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Saturday, February 14, 2026
Thursday, January 22, 2026
समाधान
एक आम आदमी अपनी रोजमर्रा की जरूरतें पूरी करने की जद्दोजहद में लगा रहता है और एक सकून भरी जिंदगी जीने के लिए के लिए टैक्स देता है और सरकार या महकमों से बेसिक सुविधाओं की आशा करता है। ये सुविधाएं वो कोई मुफ्त में नहीं लेता बल्कि उसका पूरा खर्चा भी टैक्स के रूप में खुद ही वहन करता है। इस टैक्स से ही इन महकमों में काम कर रहे लोग मोटी -मोटी तनख्वाहें लेते हैं। हमारे यहाँ कोई भी काम या किसी भी शिकायत की सुनवाई कोई न कोई बड़ी दुर्घटना के बाद ही होती है और उस सबका खामियाजा भी इसी टैक्सपेयर को अपनी जान-माल के नुक्सान से ही चुकाना पड़ता है।
इन महकमों में काम कर रहे लोगों की ऐसी क्या मानसिकता है कि इनके कान पर कोई जूँ ही नहीं रेंगती और मजे की बात ये कि ये किसी बड़ी दुर्घटना के बाद भी नहीं जागते। पता नहीं किस बात का इन्तजार करते हैं ?
हाल ही में भोपाल की सोसाइटी की लिफ्ट में हुई दुर्घटना व नोएडा की घटना इसका जीता जागता उदहारण है। पहले हुए हादसे की शिकायत लोगों द्वारा की जा चुकी थी लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई। नोएडा में हुए हादसे के समय महकमें के सभी लोग दुर्घटना स्थल पर मौजूद थे पर कोई भी समाधान न निकाल पाए और बड़े ही सहज तरीके से सब कुछ घटित होते देखते रहे।
किसी दूर दराज इलाके में संसाधनों की कमी या अन्य किसी कारण के कभी-कभी ऐसा हादसा हो जाता है लेकिन चमकती दमकती देश की राजधानी में ऐसा हादसा सिर्फ इन महकमों की लापरवाही ही दिखाता है।
इस हादसे के साथ ही इन गगनचुम्बी ईमारतों में करोड़ों के माचिस की डिब्बी जैसे मकानों में रह रहे इन टैक्सपेयर व आम आदमी की क्या हालत है और उसकी जान कितनी सस्ती है ये कड़वी सच्चाई भी सामने आ गयी है।
कभी मेट्रो, लिफ्ट,आगजनी, पानी, सड़क पर होने वाले हादसे, प्राकृतिक आपदाओं, अचानक हार्ट अटैक या इस प्रकार की किसी भी परिस्थिति या हादसों से बचने के लिए लोगों को कुछ बेसिक कौशल जैसे-तैराकी,फर्स्ट ऐड, साधारण टूल्स आदि का प्रयोग सीखना ही चाहिए। जिससे ऐसी परिस्थिति में व्यक्ति किसी बाहरी सहायता का इंतज़ार न करे और समय रहते अपने साथ ही दूसरों की जान भी बचा सके।
सरकारों को भी समाज में बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक को डिजास्टर मैनेजमेंट या आपदा प्रबंधन की बेसिक जानकारी तो अवशय देनी चाहिए। ऐसे हादसों से बचने के लिए स्कूलों व कॉलेज में ट्रेनिंग मिलनी चाहिए और इसे मेंडेटरी कर देना चाहिए व समय-समय पर इन हादसों में जान बचाने वाले लोगों को अपने अनुभव शेयर करने के लिए संस्थानों, सोसाइटी, पब्लिक प्लेसेस आदि में बुलाना चाहिए व साथ ही मॉक ड्रिल भी होनी चाहियें।
इन हादसों से बचने के लिए महकमें के लोगों को जनता द्वारा मिली शिकायतों पर तुरंत कार्यवाही करना चाहिए और सबसे बड़ी बात जान बचाने वाले किसी भी विशेष अधिकारी या व्यक्ति को आम जनता के बीच सम्मानित किया जाना चाहिए जिससे अन्य लोग भी उनके अनुभवों से कुछ सीख सकें।
वैसे तो विपत्ति के समय संयम, चतुरता, अनुभव, साहस, विवेक और ज्ञान जैसे गुण ही व्यक्ति के सच्चे दोस्त होते हैं जो हर कठिन परिस्थिति में मनुष्य का साथ निभाते हैं और उसकी रक्षा करते हैं।
Friday, January 9, 2026
निर्माता
समाज में कुछ ही पद गरिमामयी माने जाते हैं। इन पदों पर काम करने वाले लोगों की समाज में अपनी ही एक पहचान व छवि होती है। इन्हीं में एक पद है अध्यापक का। जो बच्चों के जीवन को ज्ञान के प्रकाश से उज्ज्वलित करता है व एक मजबूत भविष्य का निर्माण करता है।
पिछले दिनों दूर व शहर के ही कुछ स्कूलों में जाना हुआ और वहाँ मुझे कुछ बातें बहुत सारे स्कूलों में एक जैसी ही दिखीं और इस सबसे काफी निराशा भी हुई।
जैसे - खाली पड़े कमरे और बरामदे, उधड़ी दीवारें, टूटा फर्नीचर, धूल खा रहीं अध्यापकों की कुर्सी और मेज। बच्चे नदारद और अगर आ भी जाएँ तो उन्हें जल्दी वापस भेज दिया जाता है।अध्यापक, प्रधानाचार्य व दूसरे सभी कर्मचारी अपने ही हिसाब से स्कूल आते हैं। स्कूल का कोई निश्चित समय नहीं है व कोई निरिक्षण भी नहीं होता। पानी,भोजन, शौचालय, साफ़-सफाई आदि की कोई व्यवस्था नहीं। सम्बंधित अधिकारी गायब। एक कमरे में काफी रौनक दिखती है जहाँ अध्यापक बैठे गप्पें हाँक रहे हैं। हँसी-ठठ्ठे, खाना-पीना, शोर- शराबा खूब हो रहा है। कोई भी अध्यापक अपनी कक्षा में जाने को राजी नहीं है। बच्चे मोबाइल पर अपने ही अध्यापकों के साथ रील बना रहे हैं और किसी को भी किसी का कोई डर नहीं है। ऊपर से लेकर नीचे तक सब एक जैसे।
कहीं-कहीं बच्चे तो कक्षा में हैं लेकिन अध्यापकों की पढ़ाने में कोई रूचि नहीं है। इसके परिणाम स्वरूप बच्चे लिखने ,पढ़ने के साथ-साथ हिंदी, अंग्रेजी, गणित जैसे विषयों में कोरे ही रह गए हैं। बच्चे अपना नाम तक लिखना नहीं सीख पाए हैं और यूं ही इन स्कूलों में एक से दूसरी कक्षाओं में पहुँच जाते हैं।
बहुत सारे अध्यापकों को अपने विषय के साथ ही अपने देश व समाज में हो रही किसी भी गतिविधि के बारे में व अन्य किसी भी विषय के बारे में कोई जानकारी ही नहीं है। उन्हें खुद भी पढ़ना, लिखना नहीं आता है।
एक पूरा का पूरा,कक्षा पहली से पाँचवी तक के बच्चों का रेला ऐसे ही अशिक्षित व अनपढ़ ही समाज में भेजा जा रहा है।
एक-दो अध्यापकों से मेरी बात हुई। मेरे ये कहने पर कि - आप इन बच्चों को पढ़ाने की तनख्वाह लेते हैं। जब आप पढ़ाते ही नहीं हैं और स्कूलों में बच्चे भी नहीं हैं तो फिर तनख्वाह कैसी ?
तब एक बहुत ही कड़वा सच सामने आया। उन्होंने कहा कि- कागज़ों में तो बच्चों की हाजिरी दिख ही रही है न और हम ही क्यों माथा-पच्ची करें जब कोई भी नहीं पढ़ाता। चमचों की नौकरी आराम से चलती है। तनख्वाह देर सवेर हमें मिल ही जाती है। क्यों इतना टेंशन लें हम। ईमानदार लोगों की कोई इज्ज़त नहीं है। क्या ही मिल जाएगा मेहनत करके ? हमारे अकाउंट में तनख्वाह आती रहे बस।
मुझे बहुत ही आश्चर्य हुआ कि ऐसी सोच रखने वाले लोग इस गरिमामय पद पर आ कैसे गए ?
इस सब के विपरीत स्कूल में अगर कोई भी चाहे वह प्रधानाचार्य,अध्यापक या कोई कर्मचारी अपना काम ईमानदारी से कर भी रहा है तो उसे स्कूल में अन्य लोगों द्वारा मानसिक व मौखिक रूप से परेशान किया जाता है।
मेरा मानना है कि कम से कम अपने काम के प्रति तो व्यक्ति में ईमानदारी होनी ही चाहिए। इस पद पर सिर्फ उन्हीं लोगों को आना चाहिए जो पूरे उत्साह व लगन से बच्चों के उच्च भविष्य के लिए कार्य कर सकें व जिनमें बच्चों के लिए प्रेम व सदभाव की भावना के साथ ही समाज के प्रति एक जिम्मेदारी का एहसास भी हो।
दुर्भाग्य से आज समाज की नींव रखने वाले खुद ही जर्ज़र अवस्था में हैं तथा मानसिक रूप से पीड़ित हैं व अपनी ही तरह की खोखली,अज्ञानी व अशिक्षित पीढ़ी समाज को सौंप रहे हैं।
कुछ अपवादों को छोड़कर तथा इन सब बातों के बावजूद भी वो सभी अधिकारी, प्रधानाचार्य,अध्यापक व कर्मचारी प्रशंसा के पात्र हैं जो पूरी निष्ठा व ईमानदारी से अपने स्कूलों में कार्य कर रहे हैं तथा इस पद की गरिमा को बनाये रखें हैं व अपने कर्तव्य का पालन कर रहे हैं।
Thursday, December 11, 2025
Wednesday, November 26, 2025
My poems, along with the works of many respected literary figures, were published in the February-March 2025 issue of "Nayi Dhara," a prestigious Hindi magazine that has been published for the past 75 years. Many thanks to the editor.
हिन्दी की प्रतिष्ठित व पिछले ७५ साल से प्रकाशित हो रही पत्रिका " नई धारा " के फरवरी-मार्च २०२५ के अंक में अनेक माननीय साहित्यकारों की रचनाओं के साथ ही मेरी कविताओं का भी प्रकाशन हुआ है। सम्पादक जी का बहुत-बहुत धन्यवाद।Saturday, October 18, 2025
Sunday, September 14, 2025
Sunday, August 10, 2025
Wednesday, July 30, 2025
Wednesday, April 30, 2025
Friday, April 25, 2025
क्षति
जो कुछ भी कश्मीर घूमने गए लोगों के साथ हुआ उसकी जितनी निंदा की जाए कम है।
सरकार व लोगों के अनवरत प्रयासों, अनगिनत शहादतों, कठोर निर्णयों व अनेकों सालों के बाद कश्मीर में प्रशंसनीय प्रगति देखने को मिली। कुछ स्थानीय लोग सरकार की नीतियों की निंदा करते रहे, कुढ़ते रहे, खिसियाते रहे, लोगों को गुमराह करते रहे और बदलाव भी देखते रहे। अंत में फिर न चाहते हुए भी अनेकों योजनाओं व मुख्य धारा से जुड़ने लगे।
यहाँ के लोगों को कुछ ही दिनों में विकास, सुविधाएँ, रोज़गार,शिक्षा,व्यापार,कमाई, साफ़-सफ़ाई, पैसा, ख़ुशहाली, समृद्धि और अनगिनत लाभ देखने को मिले। इनकी प्रगति को पूरे देश के साथ-साथ विश्व भी देख रहा था। यहाँ के मूल निवासियों के व्यापार चल निकले थे और लोग सम्पन्न हो रहे थे। ज़िंदगी जैसे तैसे बढ़िया ही चल रही थी। कमाई भी अच्छी हो रही थी। शिक्षा के साथ रोजगार के नए अवसर लोगों को मिलने लगे। सभी प्रकार की सुविधाएं व योजनाएं इन लोगों को मिलने लगीं। एक आम आदमी अपने परिवार व बच्चों की खुशहाली ही तो चाहता है।
पूरा देश यहाँ अमन चैन की दुआ करता रहता है।
यहाँ के विकास व सुरक्षा को देख बाहरी लोगों के मन में भी एक विश्वास जगा और लोग हिम्मत करके सपरिवार प्रकृति व धरती का स्वर्ग कहे जाने वाले कश्मीर का आनंद लेने के लिए पहुँचने लगे थे। घर से चलते समय एक अनजाना डर मन में हमेशा रहता ही था। फिर भी लोग पिछली सब घटनाओं को भूलकर पहुँच रहे थे।
इस घटना के बाद स्थानीय लोग इस घटना की निंदा कर रहे हैं। शहर बंद है। लेकिन लोगों को अब काम-धंधों के बंद होने का डर है। कुछ लोगों ने व्यापार बढ़ाने के लिए क़र्ज़ा भी लिया हुआ है। अब क्या होगा ? भविष्य अनिश्चित है। क्योंकि अब ग्राहक नहीं तो दुकान भी बंद। अब पता नहीं बाहर से आने वाले लोगों के मन में दुबारा विश्वास बनाने में न जाने कितना समय लगे।
सोचिये अब आपको कमाई करवाने या आपका व्यापार बढ़ाने के लिए इतनी बड़ी क़ीमत शायद ही कोई चुकाए जो एक यादगार समय अपने परिवार के साथ बिताने की उम्मीद से आपके शहर आए निर्दोष व मासूम लोगों द्वारा पहलगाम में चुकाई गयी है। इस नुकसान की कोई भरपाई नहीं है।
जल्दी ही समझने की आवश्यकता है कि अलग थलग रह कर कोई समाज विकसित नहीं हो सकता।
आपसी प्रेम, विश्वास, सहयोग से ही आप जीवन को सुंदर बना सकते हैं किसी को जान-माल का नुकसान पहुँचा कर नहीं। सतर्क रहें व अलगाववादी ताकतों को पहचानें।
उम्मीद है अब शायद स्थानीय लोग समझें कि वो भी हिंदुस्तानी हैं, हिन्दुस्तान का ही हिस्सा हैं और हम सभी एक-दूसरे पर निर्भर हैं।
ईश्वर दिवंगत आत्माओं को शांति व भटके लोगों को बुद्धि दें।

















