धर्मेंद्र प्रधान जी के इस्तीफ़े के बाद कुछ बातें…
सबसे पहले, उन सभी छात्रों को बधाई जिन्होंने अपनी बात लोकतांत्रिक तरीके से सरकार तक पहुँचाई। किसी भी लोकतंत्र में जनता की आवाज़ सुनी जानी चाहिए और इस पूरे घटनाक्रम ने यह साबित भी किया।
लेकिन इस पूरे आंदोलन के दौरान कुछ बातें ऐसी भी सामने आईं, जिन्होंने मन को सोचने पर मजबूर कर दिया।
मैं उन अभिभावकों की पीढ़ी से हूँ, जिन्हें आज की पीढ़ी Millennials कहती है। हमने पूरी कोशिश की कि अपने बच्चों को अच्छे संस्कार, ईमानदारी, धैर्य और मेहनत का महत्व सिखा सकें। फिर भी, कहीं-न-कहीं ऐसा लगता है कि हम कुछ मामलों में सफल नहीं हो पाए।
आज की पीढ़ी प्रतिभाशाली है, आत्मविश्वासी है और अपनी बात खुलकर कहती है। यह उसकी सबसे बड़ी ताकत है। लेकिन साथ ही, एक चिंता भी दिखाई देती है—सब कुछ बहुत जल्दी पाने की इच्छा। जबकि जीवन का सच यह है कि हर बड़ी सफलता का कोई शॉर्टकट नहीं होता। दुनिया के हर सफल व्यक्ति की अपनी संघर्षगाथा होती है। सम्मान, पहचान और सफलता मेहनत, धैर्य और ईमानदारी से ही मिलती है।
जीवन हमेशा हमें दो रास्ते देता है। पहला रास्ता कठिन होता है—संघर्ष, धैर्य और परिश्रम का। दूसरा रास्ता आसान दिखता है—शॉर्टकट, अनैतिक साधनों और गलत तरीकों का। निर्णय हमें करना होता है कि हम कौन-सा रास्ता चुनेंगे।
अब मैं आप सबसे एक प्रश्न पूछना चाहती हूँ।
क्या आप और आपके माता-पिता यह संकल्प ले सकते हैं कि जीवन में कभी भी किसी परीक्षा, किसी सरकारी काम या किसी भी लाभ के लिए भ्रष्टाचार का सहारा नहीं लेंगे? न पेपर खरीदेंगे, न खरीदने देंगे, न किसी अनुचित तरीके से सफलता पाने की कोशिश करेंगे।
NEET पेपर लीक जैसे मामलों में जिन लोगों ने प्रश्नपत्र खरीदे, क्या उन्होंने कभी यह सोचा कि यदि उनका बच्चा इस तरह डॉक्टर बन भी गया, तो वह किस प्रकार का डॉक्टर बनेगा? क्या मरीज के मन में कभी यह शंका नहीं आएगी कि उसका इलाज करने वाला डॉक्टर अपनी मेहनत से यहाँ पहुँचा है या किसी पेपर लीक की वजह से?
यह केवल एक परीक्षा का प्रश्न नहीं है। यह समाज के विश्वास का प्रश्न है।
कुछ लोगों की बेईमानी की कीमत लाखों मेहनती छात्रों ने चुकाई। कई परिवार टूट गए, अनेक बच्चों का भविष्य प्रभावित हुआ और समाज का भरोसा भी कमजोर हुआ। यह किसी भी सभ्य समाज के लिए चिंता का विषय है।
हम अक्सर हर समस्या का समाधान सरकार से चाहते हैं। लेकिन सच यह है कि सरकार अकेले भ्रष्टाचार समाप्त नहीं कर सकती। जब तक समाज स्वयं ईमानदारी का साथ नहीं देगा, तब तक कोई भी कानून पूरी तरह सफल नहीं हो सकता।
अगर खरीदने वाले ही नहीं होंगे, तो बेचने वाले अपने-आप खत्म हो जाएंगे।
आज समय आ गया है कि हम केवल सरकार से प्रश्न न करें, बल्कि स्वयं से भी प्रश्न करें। क्या हम अपने बच्चों को केवल सफल बनाना चाहते हैं, या एक अच्छा और ईमानदार इंसान भी बनाना चाहते हैं?
पहले कहा जाता था—“जैसा राजा, वैसी प्रजा।” लेकिन आज यह कहना अधिक उचित होगा—“जैसी प्रजा, वैसा राजा।” क्योंकि लोकतंत्र में सरकार भी उसी समाज का प्रतिबिंब होती है।
आज मैं विशेष रूप से युवाओं से कहना चाहती हूँ कि आपके पास देश को बदलने की सबसे बड़ी शक्ति है। यदि आप यह संकल्प ले लें कि न कभी भ्रष्टाचार करेंगे, न उसे स्वीकार करेंगे और न ही उसे छिपाएँगे। यदि कभी आपको किसी परीक्षा का पेपर खरीदने, किसी गलत तरीके से लाभ लेने या किसी भ्रष्टाचार का प्रस्ताव मिले, तो उसे ठुकराइए और उसकी सूचना संबंधित अधिकारियों को दीजिए। यही सच्ची देशभक्ति है। यही आपकी मेहनत, आपके भविष्य और लाखों अन्य छात्रों के सपनों की रक्षा करेगा।
आइए, आज हम सब मिलकर यह प्रण लें कि सफलता चाहे देर से मिले, लेकिन ईमानदारी और मेहनत के रास्ते से ही मिले।
यही एक मजबूत समाज, सुरक्षित भविष्य और सशक्त भारत की नींव है।

























