Happy Navratri Day - 9
स्याह मोती उजले पन्नों पर ...
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Friday, March 27, 2026
Tuesday, February 24, 2026
DEVELOPMENT - विकास
ये क्या कर रहे हो ? इन पौधों को क्यों उखाड़ रहे हो ?
ये मेरे रास्ते में अटक रहे हैं। मैं रास्ता चौड़ा व पक्का करना चाहता हूँ जिससे रास्ता दिखने में सुन्दर लगे और मुझे साइकिल चलाने में आसानी हो तथा लोग भी आराम से आ-जा सकें।
वो तो ठीक है लेकिन इन्हें यहाँ से उखाड़ने से पहले इन्हें कहीं दूसरी जगह लगाने का इंतजाम तो करो। इन जिन्दा हरे-भरे पौधों को इनकी जगह से उखाड़ कर क्यों मार देना चाहते हो ?
तुम्हें किसी भी बदलाव के लिए उसका विकल्प भी अवशय प्रस्तुत करना चाहिए।
ENCOURAGMENT, APPRECIATION - प्रोत्साहन
अरे ! आंटी जी ये सब क्या फैला रखा है ? कुछ काम चल रहा है क्या ?
हाँ बेटा। तेरे अंकल जी अपनी अलमारी दुबारा बनवा रहे हैं। इतने सारे सम्मान, तस्वीरें, उपहार आदि हो गए हैं अब अलमारी छोटी पड़ने लगी है।
हाँ ये बात तो है। अंकल जी हैं ही इतने बड़े कलाकार। पर आप बुरा न माने तो एक बात कहूँ अगर अंकल जी हम जैसे युवा वर्ग को भी आगे बढ़ने का अवसर दें तो एक अलमारी हम भी अपने यहां बनवा लें। इतनी योग्यता तो हम सब में भी है।
कई लोगों द्वारा दुनिया भर की प्रसिद्धि और सम्मान प्राप्त करने के बाद भी अपनी जगह छोड़ पाना नामुमकिन है और शायद इसी कारण से अनेकों योग्य लोग आगे नहीं आ पाते और कहीं अपनी प्रतिभा के साथ गुमनामी के अँधेरे में खो जाते हैं।
अपनी कुर्सी छोड़ दूसरे लोगों को आगे बढ़ाने के लिए बहुत बड़ा कलेजा चाहिए।
Thursday, January 22, 2026
समाधान
एक आम आदमी अपनी रोजमर्रा की जरूरतें पूरी करने की जद्दोजहद में लगा रहता है और एक सकून भरी जिंदगी जीने के लिए के लिए टैक्स देता है और सरकार या महकमों से बेसिक सुविधाओं की आशा करता है। ये सुविधाएं वो कोई मुफ्त में नहीं लेता बल्कि उसका पूरा खर्चा भी टैक्स के रूप में खुद ही वहन करता है। इस टैक्स से ही इन महकमों में काम कर रहे लोग मोटी -मोटी तनख्वाहें लेते हैं। हमारे यहाँ कोई भी काम या किसी भी शिकायत की सुनवाई कोई न कोई बड़ी दुर्घटना के बाद ही होती है और उस सबका खामियाजा भी इसी टैक्सपेयर को अपनी जान-माल के नुक्सान से ही चुकाना पड़ता है।
इन महकमों में काम कर रहे लोगों की ऐसी क्या मानसिकता है कि इनके कान पर कोई जूँ ही नहीं रेंगती और मजे की बात ये कि ये किसी बड़ी दुर्घटना के बाद भी नहीं जागते। पता नहीं किस बात का इन्तजार करते हैं ?
हाल ही में भोपाल की सोसाइटी की लिफ्ट में हुई दुर्घटना व नोएडा की घटना इसका जीता जागता उदहारण है। पहले हुए हादसे की शिकायत लोगों द्वारा की जा चुकी थी लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई। नोएडा में हुए हादसे के समय महकमें के सभी लोग दुर्घटना स्थल पर मौजूद थे पर कोई भी समाधान न निकाल पाए और बड़े ही सहज तरीके से सब कुछ घटित होते देखते रहे।
किसी दूर दराज इलाके में संसाधनों की कमी या अन्य किसी कारण के कभी-कभी ऐसा हादसा हो जाता है लेकिन चमकती दमकती देश की राजधानी में ऐसा हादसा सिर्फ इन महकमों की लापरवाही ही दिखाता है।
इस हादसे के साथ ही इन गगनचुम्बी ईमारतों में करोड़ों के माचिस की डिब्बी जैसे मकानों में रह रहे इन टैक्सपेयर व आम आदमी की क्या हालत है और उसकी जान कितनी सस्ती है ये कड़वी सच्चाई भी सामने आ गयी है।
कभी मेट्रो, लिफ्ट,आगजनी, पानी, सड़क पर होने वाले हादसे, प्राकृतिक आपदाओं, अचानक हार्ट अटैक या इस प्रकार की किसी भी परिस्थिति या हादसों से बचने के लिए लोगों को कुछ बेसिक कौशल जैसे-तैराकी,फर्स्ट ऐड, साधारण टूल्स आदि का प्रयोग सीखना ही चाहिए। जिससे ऐसी परिस्थिति में व्यक्ति किसी बाहरी सहायता का इंतज़ार न करे और समय रहते अपने साथ ही दूसरों की जान भी बचा सके।
सरकारों को भी समाज में बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक को डिजास्टर मैनेजमेंट या आपदा प्रबंधन की बेसिक जानकारी तो अवशय देनी चाहिए। ऐसे हादसों से बचने के लिए स्कूलों व कॉलेज में ट्रेनिंग मिलनी चाहिए और इसे मेंडेटरी कर देना चाहिए व समय-समय पर इन हादसों में जान बचाने वाले लोगों को अपने अनुभव शेयर करने के लिए संस्थानों, सोसाइटी, पब्लिक प्लेसेस आदि में बुलाना चाहिए व साथ ही मॉक ड्रिल भी होनी चाहियें।
इन हादसों से बचने के लिए महकमें के लोगों को जनता द्वारा मिली शिकायतों पर तुरंत कार्यवाही करना चाहिए और सबसे बड़ी बात जान बचाने वाले किसी भी विशेष अधिकारी या व्यक्ति को आम जनता के बीच सम्मानित किया जाना चाहिए जिससे अन्य लोग भी उनके अनुभवों से कुछ सीख सकें।
वैसे तो विपत्ति के समय संयम, चतुरता, अनुभव, साहस, विवेक और ज्ञान जैसे गुण ही व्यक्ति के सच्चे दोस्त होते हैं जो हर कठिन परिस्थिति में मनुष्य का साथ निभाते हैं और उसकी रक्षा करते हैं।
Friday, January 9, 2026
निर्माता
समाज में कुछ ही पद गरिमामयी माने जाते हैं। इन पदों पर काम करने वाले लोगों की समाज में अपनी ही एक पहचान व छवि होती है। इन्हीं में एक पद है अध्यापक का। जो बच्चों के जीवन को ज्ञान के प्रकाश से उज्ज्वलित करता है व एक मजबूत भविष्य का निर्माण करता है।
पिछले दिनों दूर व शहर के ही कुछ स्कूलों में जाना हुआ और वहाँ मुझे कुछ बातें बहुत सारे स्कूलों में एक जैसी ही दिखीं और इस सबसे काफी निराशा भी हुई।
जैसे - खाली पड़े कमरे और बरामदे, उधड़ी दीवारें, टूटा फर्नीचर, धूल खा रहीं अध्यापकों की कुर्सी और मेज। बच्चे नदारद और अगर आ भी जाएँ तो उन्हें जल्दी वापस भेज दिया जाता है।अध्यापक, प्रधानाचार्य व दूसरे सभी कर्मचारी अपने ही हिसाब से स्कूल आते हैं। स्कूल का कोई निश्चित समय नहीं है व कोई निरिक्षण भी नहीं होता। पानी,भोजन, शौचालय, साफ़-सफाई आदि की कोई व्यवस्था नहीं। सम्बंधित अधिकारी गायब। एक कमरे में काफी रौनक दिखती है जहाँ अध्यापक बैठे गप्पें हाँक रहे हैं। हँसी-ठठ्ठे, खाना-पीना, शोर- शराबा खूब हो रहा है। कोई भी अध्यापक अपनी कक्षा में जाने को राजी नहीं है। बच्चे मोबाइल पर अपने ही अध्यापकों के साथ रील बना रहे हैं और किसी को भी किसी का कोई डर नहीं है। ऊपर से लेकर नीचे तक सब एक जैसे।
कहीं-कहीं बच्चे तो कक्षा में हैं लेकिन अध्यापकों की पढ़ाने में कोई रूचि नहीं है। इसके परिणाम स्वरूप बच्चे लिखने ,पढ़ने के साथ-साथ हिंदी, अंग्रेजी, गणित जैसे विषयों में कोरे ही रह गए हैं। बच्चे अपना नाम तक लिखना नहीं सीख पाए हैं और यूं ही इन स्कूलों में एक से दूसरी कक्षाओं में पहुँच जाते हैं।
बहुत सारे अध्यापकों को अपने विषय के साथ ही अपने देश व समाज में हो रही किसी भी गतिविधि के बारे में व अन्य किसी भी विषय के बारे में कोई जानकारी ही नहीं है। उन्हें खुद भी पढ़ना, लिखना नहीं आता है।
एक पूरा का पूरा,कक्षा पहली से पाँचवी तक के बच्चों का रेला ऐसे ही अशिक्षित व अनपढ़ ही समाज में भेजा जा रहा है।
एक-दो अध्यापकों से मेरी बात हुई। मेरे ये कहने पर कि - आप इन बच्चों को पढ़ाने की तनख्वाह लेते हैं। जब आप पढ़ाते ही नहीं हैं और स्कूलों में बच्चे भी नहीं हैं तो फिर तनख्वाह कैसी ?
तब एक बहुत ही कड़वा सच सामने आया। उन्होंने कहा कि- कागज़ों में तो बच्चों की हाजिरी दिख ही रही है न और हम ही क्यों माथा-पच्ची करें जब कोई भी नहीं पढ़ाता। चमचों की नौकरी आराम से चलती है। तनख्वाह देर सवेर हमें मिल ही जाती है। क्यों इतना टेंशन लें हम। ईमानदार लोगों की कोई इज्ज़त नहीं है। क्या ही मिल जाएगा मेहनत करके ? हमारे अकाउंट में तनख्वाह आती रहे बस।
मुझे बहुत ही आश्चर्य हुआ कि ऐसी सोच रखने वाले लोग इस गरिमामय पद पर आ कैसे गए ?
इस सब के विपरीत स्कूल में अगर कोई भी चाहे वह प्रधानाचार्य,अध्यापक या कोई कर्मचारी अपना काम ईमानदारी से कर भी रहा है तो उसे स्कूल में अन्य लोगों द्वारा मानसिक व मौखिक रूप से परेशान किया जाता है।
मेरा मानना है कि कम से कम अपने काम के प्रति तो व्यक्ति में ईमानदारी होनी ही चाहिए। इस पद पर सिर्फ उन्हीं लोगों को आना चाहिए जो पूरे उत्साह व लगन से बच्चों के उच्च भविष्य के लिए कार्य कर सकें व जिनमें बच्चों के लिए प्रेम व सदभाव की भावना के साथ ही समाज के प्रति एक जिम्मेदारी का एहसास भी हो।
दुर्भाग्य से आज समाज की नींव रखने वाले खुद ही जर्ज़र अवस्था में हैं तथा मानसिक रूप से पीड़ित हैं व अपनी ही तरह की खोखली,अज्ञानी व अशिक्षित पीढ़ी समाज को सौंप रहे हैं।
कुछ अपवादों को छोड़कर तथा इन सब बातों के बावजूद भी वो सभी अधिकारी, प्रधानाचार्य,अध्यापक व कर्मचारी प्रशंसा के पात्र हैं जो पूरी निष्ठा व ईमानदारी से अपने स्कूलों में कार्य कर रहे हैं तथा इस पद की गरिमा को बनाये रखें हैं व अपने कर्तव्य का पालन कर रहे हैं।



























