स्याह मोती उजले पन्नों पर ...
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Monday, October 12, 2026
Friday, September 4, 2026
जेन-ज़ी को कटघरे में खड़ा करने से पहले आईना देखिए
पिछले कुछ समय से एक शब्द हमारे घरों, चर्चाओं और सोशल मीडिया पर लगातार सुनाई दे रहा है—जेन-ज़ी। पहले जिन लोगों को इस शब्द का अर्थ तक नहीं पता था, वे भी अब इसके बारे में अपनी राय रखने लगे हैं। मीडिया ने इस पीढ़ी के पहनावे, भाषा, व्यवहार और विचारों की एक खास तस्वीर हमारे सामने रखी और हमने बिना गहराई से सोचे उसी तस्वीर को सच मान लिया।
अब हालात यह हैं कि बच्चे ने कोई सवाल पूछ दिया, अपनी बात मजबूती से रख दी या परंपरागत सोच से अलग निर्णय लेना चाहा, तो तुरंत कह दिया जाता है - “आजकल की जेन-ज़ी ऐसी ही है।”
लेकिन किसी पूरी पीढ़ी को दोष देने से पहले एक प्रश्न स्वयं से भी पूछा जाना चाहिए—इस पीढ़ी को ऐसा बनाया किसने है?
उत्तर शायद हमें असहज कर सकता है, क्योंकि इस पीढ़ी के निर्माण में सबसे बड़ी भूमिका हमारी ही है।
बच्चे समस्याएं लेकर पैदा नहीं होते - कोई भी बच्चा जन्म से असंवेदनशील, उद्दंड या संस्कारहीन नहीं होता। हर बच्चे का अपना स्वभाव अवश्य होता है, लेकिन उसके व्यक्तित्व की दिशा उसका परिवार, परिवेश, शिक्षा और अनुभव तय करते हैं। कहा जाता है कि बच्चे के संस्कारों की शुरुआत गर्भ से ही हो जाती है। गर्भावस्था के दौरान मां की मानसिक स्थिति, उसके विचार, उसकी जीवनशैली और घर का वातावरण बच्चे के विकास को प्रभावित करते हैं। जन्म के बाद वही बच्चा परिवार की भाषा, व्यवहार, आदतें और संबंधों को देखकर दुनिया को समझना शुरू करता है।
हमारे समाज में कहा जाता रहा है। जैसा अन्न, वैसा मन और जैसी संगत, वैसी रंगत। फिर आज के बच्चों के व्यवहार की चर्चा करते समय हम इस बात को क्यों भूल जाते हैं ?
जेन-ज़ी को गलत मत समझिए - जेन-ज़ी किसी बीमारी, कमी या अपमान का नाम नहीं है। यह केवल एक विशेष समय में जन्मी पीढ़ी को पहचानने के लिए प्रयोग किया जाने वाला शब्द है। “यह तो जेन-ज़ी है, इसे क्या पता”, “आजकल के बच्चे बदतमीज़ हैं” या “इनमें संस्कार ही नहीं हैं”—इस प्रकार के वाक्य समस्या को समझने के बजाय बच्चों को अपमानित करते हैं। आज के बच्चे जानकारी के मामले में पहले की पीढ़ियों से अधिक सक्षम हैं। वे तकनीक को तेजी से समझते हैं, सवाल पूछते हैं और किसी बात को केवल इसलिए स्वीकार नहीं करते कि वह वर्षों से चली आ रही है। वे तर्क चाहते हैं। उनके प्रश्नों को बदतमीजी मान लेना आसान है, लेकिन उनका उत्तर देना कठिन है। शायद इसीलिए कई बार हम संवाद करने के बजाय उन्हें दोषी ठहरा देते हैं।
किशोरावस्था अपराध नहीं, परिवर्तन का समय है - हमारे समाज में किशोरावस्था को अक्सर “बिगड़ने की उम्र” कह दिया जाता है। जबकि यह वह समय है जब बच्चा स्वयं को पहचानने की कोशिश करता है। उसके शरीर, सोच और भावनाओं में तेजी से बदलाव आते हैं। वह प्रश्न पूछता है, अपनी बात रखना चाहता है और स्वतंत्र निर्णय लेने की इच्छा महसूस करता है। इस उम्र में बच्चों को सबसे अधिक संवाद, विश्वास और मार्गदर्शन की आवश्यकता होती है। लेकिन अक्सर उन्हें डांट, तुलना और ताने मिलते हैं। उन्हें कहा जाता है कि पड़ोसी का बच्चा उनसे बेहतर है, रिश्तेदार का बेटा अधिक अंक लाया है या उनकी उम्र में उनके माता-पिता अधिक जिम्मेदार थे। लगातार तुलना बच्चों में आत्मविश्वास नहीं, बल्कि हीनभावना, तनाव और दूरी पैदा करती है। फिर जब वे अपने मन की बात घर में नहीं कहते, तो हम शिकायत करते हैं कि बच्चे माता-पिता से कुछ साझा नहीं करते।
अपेक्षाएं हमारी, दबाव बच्चों पर - हम चाहते हैं कि बच्चे अच्छे अंक लाएं, हर प्रतियोगिता में आगे रहें, अनुशासित रहें, संस्कारी हों और भविष्य भी हमारी इच्छा के अनुसार चुनें। पढ़ाई उन्हें करनी है, परीक्षा उन्हें देनी है, प्रतिस्पर्धा उन्हें झेलनी है और असफलता का डर भी उन्हें ही सहना है। लेकिन विषय कौन-सा चुनना है, करियर क्या होना चाहिए, कपड़े कैसे पहनने हैं, मित्र किसे बनाना है और जीवन किस प्रकार जीना है—इन सभी फैसलों पर अधिकार हम अपना मानते हैं। बच्चे जब घर से बाहर निकलते हैं तो उन्हें अलग-अलग परिवारों, संस्कृतियों और विचारों वाले लोग मिलते हैं। घर में उन्हें कुछ और सिखाया जाता है, जबकि बाहर की दुनिया कुछ और दिखाती है। सोशल मीडिया तीसरी तरह की जिंदगी उनके सामने प्रस्तुत करता है। ऐसे में बच्चे भ्रमित होते हैं। वे न पूरी तरह घर की अपेक्षाओं के अनुसार जी पाते हैं और न बाहरी दुनिया को समझ पाते हैं। इस आंतरिक संघर्ष को समझने के बजाय हम उन्हें बिगड़ा हुआ घोषित कर देते हैं।
संस्कार केवल उपदेश से नहीं आते - हम बच्चों से सच बोलने की अपेक्षा करते हैं, लेकिन क्या हम स्वयं उनके सामने कभी झूठ नहीं बोलते? हम उन्हें मोबाइल कम चलाने को कहते हैं, लेकिन क्या भोजन की मेज पर हमारा अपना फोन अलग रहता है? हम चाहते हैं कि वे बड़ों का सम्मान करें, लेकिन क्या वे हमें घर में काम करने वाले लोगों, रिश्तेदारों और एक-दूसरे से सम्मानपूर्वक बात करते देखते हैं? बच्चे केवल वह नहीं सीखते जो हम उन्हें कहते हैं। वे मुख्य रूप से वह सीखते हैं जो हमें करते हुए देखते हैं। संस्कार भाषण देने से नहीं आते। संस्कार घर के दैनिक व्यवहार से आते हैं। यदि घर में सम्मान, प्रेम, अनुशासन, संवाद और संवेदनशीलता होगी, तो बच्चा इन्हीं मूल्यों को आत्मसात करेगा। यदि घर में तनाव, अपमान, दिखावा और लगातार तुलना होगी, तो उसका प्रभाव भी बच्चे पर पड़ेगा।
हमें अपनी जिम्मेदारी स्वीकार करनी होगी - यह कहना उचित नहीं होगा कि बच्चों की हर गलती के लिए माता-पिता ही जिम्मेदार हैं। बच्चे भी अपने निर्णय लेते हैं और उनके निर्णयों के परिणाम होते हैं। लेकिन यह भी सच है कि उनकी सोच और व्यवहार का बड़ा हिस्सा उस वातावरण से बनता है जो हमने उन्हें दिया है। आज समाज में प्रतिस्पर्धा, उपभोक्तावाद, दिखावा और डिजिटल प्रभाव बढ़ चुका है। बच्चे हर दिन सैकड़ों संदेशों और विचारों के संपर्क में आते हैं। ऐसे समय में केवल रोक-टोक पर्याप्त नहीं है। उन्हें सही और गलत के बीच अंतर करना सिखाना होगा। उनसे केवल यह कहना कि “मोबाइल मत चलाओ” समाधान नहीं है। उन्हें यह भी समझाना होगा कि इंटरनेट का जिम्मेदारी से उपयोग कैसे किया जाए। केवल यह कहना कि “अच्छे संस्कार रखो” पर्याप्त नहीं है। घर में उन संस्कारों को जीकर भी दिखाना होगा।
इनसे शिकायत नहीं, संवाद की आवश्यकता है - किसी पूरी पीढ़ी को दोष देना सबसे आसान रास्ता है। कठिन काम है उनकी दुनिया को समझना, उनके प्रश्न सुनना और अपनी गलतियों को स्वीकार करना। बच्चे हमारे विरोधी नहीं हैं। वे हमारे ही घरों में पले हैं, हमारी आदतों को देखकर बड़े हुए हैं और उसी समाज से सीख रहे हैं जिसे हमने मिलकर बनाया है। इसलिए अगली बार किसी बच्चे को “जेन-ज़ी” कहकर उसकी बात को खारिज करने से पहले हमें अपने भीतर झांकना चाहिए। अपने घर का वातावरण, अपनी भाषा, अपनी प्राथमिकताएं और अपना व्यवहार देखना चाहिए।
शायद समस्या यह नहीं है कि आज की पीढ़ी खराब है। समस्या यह है कि पुरानी और नई पीढ़ी के बीच संवाद कम होता जा रहा है। बच्चों को कटघरे में खड़ा करने से पहले हमें उनके साथ खड़ा होना होगा। उन्हें आदेश से अधिक मार्गदर्शन, आलोचना से अधिक समझ और सुविधाओं से अधिक समय देना होगा।
क्योंकि बच्चे अंततः वही बनते हैं, जो वे अपने आसपास बार-बार देखते और अनुभव करते हैं।
Tuesday, July 28, 2026
धर्मेंद्र प्रधान जी के इस्तीफ़े के बाद कुछ बातें…
सबसे पहले, उन सभी छात्रों को बधाई जिन्होंने अपनी बात लोकतांत्रिक तरीके से सरकार तक पहुँचाई। किसी भी लोकतंत्र में जनता की आवाज़ सुनी जानी चाहिए और इस पूरे घटनाक्रम ने यह साबित भी किया।
लेकिन इस पूरे आंदोलन के दौरान कुछ बातें ऐसी भी सामने आईं, जिन्होंने मन को सोचने पर मजबूर कर दिया।
मैं उन अभिभावकों की पीढ़ी से हूँ, जिन्हें आज की पीढ़ी Millennials कहती है। हमने पूरी कोशिश की कि अपने बच्चों को अच्छे संस्कार, ईमानदारी, धैर्य और मेहनत का महत्व सिखा सकें। फिर भी, कहीं-न-कहीं ऐसा लगता है कि हम कुछ मामलों में सफल नहीं हो पाए।
आज की पीढ़ी प्रतिभाशाली है, आत्मविश्वासी है और अपनी बात खुलकर कहती है। यह उसकी सबसे बड़ी ताकत है। लेकिन साथ ही, एक चिंता भी दिखाई देती है—सब कुछ बहुत जल्दी पाने की इच्छा। जबकि जीवन का सच यह है कि हर बड़ी सफलता का कोई शॉर्टकट नहीं होता। दुनिया के हर सफल व्यक्ति की अपनी संघर्षगाथा होती है। सम्मान, पहचान और सफलता मेहनत, धैर्य और ईमानदारी से ही मिलती है।
जीवन हमेशा हमें दो रास्ते देता है। पहला रास्ता कठिन होता है—संघर्ष, धैर्य और परिश्रम का। दूसरा रास्ता आसान दिखता है—शॉर्टकट, अनैतिक साधनों और गलत तरीकों का। निर्णय हमें करना होता है कि हम कौन-सा रास्ता चुनेंगे।
अब मैं आप सबसे एक प्रश्न पूछना चाहती हूँ।
क्या आप और आपके माता-पिता यह संकल्प ले सकते हैं कि जीवन में कभी भी किसी परीक्षा, किसी सरकारी काम या किसी भी लाभ के लिए भ्रष्टाचार का सहारा नहीं लेंगे? न पेपर खरीदेंगे, न खरीदने देंगे, न किसी अनुचित तरीके से सफलता पाने की कोशिश करेंगे।
NEET पेपर लीक जैसे मामलों में जिन लोगों ने प्रश्नपत्र खरीदे, क्या उन्होंने कभी यह सोचा कि यदि उनका बच्चा इस तरह डॉक्टर बन भी गया, तो वह किस प्रकार का डॉक्टर बनेगा? क्या मरीज के मन में कभी यह शंका नहीं आएगी कि उसका इलाज करने वाला डॉक्टर अपनी मेहनत से यहाँ पहुँचा है या किसी पेपर लीक की वजह से?
यह केवल एक परीक्षा का प्रश्न नहीं है। यह समाज के विश्वास का प्रश्न है।
कुछ लोगों की बेईमानी की कीमत लाखों मेहनती छात्रों ने चुकाई। कई परिवार टूट गए, अनेक बच्चों का भविष्य प्रभावित हुआ और समाज का भरोसा भी कमजोर हुआ। यह किसी भी सभ्य समाज के लिए चिंता का विषय है।
हम अक्सर हर समस्या का समाधान सरकार से चाहते हैं। लेकिन सच यह है कि सरकार अकेले भ्रष्टाचार समाप्त नहीं कर सकती। जब तक समाज स्वयं ईमानदारी का साथ नहीं देगा, तब तक कोई भी कानून पूरी तरह सफल नहीं हो सकता।
अगर खरीदने वाले ही नहीं होंगे, तो बेचने वाले अपने-आप खत्म हो जाएंगे।
आज समय आ गया है कि हम केवल सरकार से प्रश्न न करें, बल्कि स्वयं से भी प्रश्न करें। क्या हम अपने बच्चों को केवल सफल बनाना चाहते हैं, या एक अच्छा और ईमानदार इंसान भी बनाना चाहते हैं?
पहले कहा जाता था—“जैसा राजा, वैसी प्रजा।” लेकिन आज यह कहना अधिक उचित होगा—“जैसी प्रजा, वैसा राजा।” क्योंकि लोकतंत्र में सरकार भी उसी समाज का प्रतिबिंब होती है।
आज मैं विशेष रूप से युवाओं से कहना चाहती हूँ कि आपके पास देश को बदलने की सबसे बड़ी शक्ति है। यदि आप यह संकल्प ले लें कि न कभी भ्रष्टाचार करेंगे, न उसे स्वीकार करेंगे और न ही उसे छिपाएँगे। यदि कभी आपको किसी परीक्षा का पेपर खरीदने, किसी गलत तरीके से लाभ लेने या किसी भ्रष्टाचार का प्रस्ताव मिले, तो उसे ठुकराइए और उसकी सूचना संबंधित अधिकारियों को दीजिए। यही सच्ची देशभक्ति है। यही आपकी मेहनत, आपके भविष्य और लाखों अन्य छात्रों के सपनों की रक्षा करेगा।
आइए, आज हम सब मिलकर यह प्रण लें कि सफलता चाहे देर से मिले, लेकिन ईमानदारी और मेहनत के रास्ते से ही मिले।
यही एक मजबूत समाज, सुरक्षित भविष्य और सशक्त भारत की नींव है।


























