निर्माता
समाज में कुछ ही पद गरिमामयी माने जाते हैं। इन पदों पर काम करने वाले लोगों की समाज में अपनी ही एक पहचान व छवि होती है। इन्हीं में एक पद है अध्यापक का। जो बच्चों के जीवन को ज्ञान के प्रकाश से उज्ज्वलित करता है व एक मजबूत भविष्य का निर्माण करता है।
पिछले दिनों दूर व शहर के ही कुछ स्कूलों में जाना हुआ और वहाँ मुझे कुछ बातें बहुत सारे स्कूलों में एक जैसी ही दिखीं और इस सबसे काफी निराशा भी हुई।
जैसे - खाली पड़े कमरे और बरामदे, उधड़ी दीवारें, टूटा फर्नीचर, धूल खा रहीं अध्यापकों की कुर्सी और मेज। बच्चे नदारद और अगर आ भी जाएँ तो उन्हें जल्दी वापस भेज दिया जाता है।अध्यापक, प्रधानाचार्य व दूसरे सभी कर्मचारी अपने ही हिसाब से स्कूल आते हैं। स्कूल का कोई निश्चित समय नहीं है व कोई निरिक्षण भी नहीं होता। पानी,भोजन, शौचालय, साफ़-सफाई आदि की कोई व्यवस्था नहीं। सम्बंधित अधिकारी गायब। एक कमरे में काफी रौनक दिखती है जहाँ अध्यापक बैठे गप्पें हाँक रहे हैं। हँसी-ठठ्ठे, खाना-पीना, शोर- शराबा खूब हो रहा है। कोई भी अध्यापक अपनी कक्षा में जाने को राजी नहीं है। बच्चे मोबाइल पर अपने ही अध्यापकों के साथ रील बना रहे हैं और किसी को भी किसी का कोई डर नहीं है। ऊपर से लेकर नीचे तक सब एक जैसे।
कहीं-कहीं बच्चे तो कक्षा में हैं लेकिन अध्यापकों की पढ़ाने में कोई रूचि नहीं है। इसके परिणाम स्वरूप बच्चे लिखने ,पढ़ने के साथ-साथ हिंदी, अंग्रेजी, गणित जैसे विषयों में कोरे ही रह गए हैं। बच्चे अपना नाम तक लिखना नहीं सीख पाए हैं और यूं ही इन स्कूलों में एक से दूसरी कक्षाओं में पहुँच जाते हैं।
बहुत सारे अध्यापकों को अपने विषय के साथ ही अपने देश व समाज में हो रही किसी भी गतिविधि के बारे में व अन्य किसी भी विषय के बारे में कोई जानकारी ही नहीं है। उन्हें खुद भी पढ़ना, लिखना नहीं आता है।
एक पूरा का पूरा,कक्षा पहली से पाँचवी तक के बच्चों का रेला ऐसे ही अशिक्षित व अनपढ़ ही समाज में भेजा जा रहा है।
एक-दो अध्यापकों से मेरी बात हुई। मेरे ये कहने पर कि - आप इन बच्चों को पढ़ाने की तनख्वाह लेते हैं। जब आप पढ़ाते ही नहीं हैं और स्कूलों में बच्चे भी नहीं हैं तो फिर तनख्वाह कैसी ?
तब एक बहुत ही कड़वा सच सामने आया। उन्होंने कहा कि- कागज़ों में तो बच्चों की हाजिरी दिख ही रही है न और हम ही क्यों माथा-पच्ची करें जब कोई भी नहीं पढ़ाता। चमचों की नौकरी आराम से चलती है। तनख्वाह देर सवेर हमें मिल ही जाती है। क्यों इतना टेंशन लें हम। ईमानदार लोगों की कोई इज्ज़त नहीं है। क्या ही मिल जाएगा मेहनत करके ? हमारे अकाउंट में तनख्वाह आती रहे बस।
मुझे बहुत ही आश्चर्य हुआ कि ऐसी सोच रखने वाले लोग इस गरिमामय पद पर आ कैसे गए ?
इस सब के विपरीत स्कूल में अगर कोई भी चाहे वह प्रधानाचार्य,अध्यापक या कोई कर्मचारी अपना काम ईमानदारी से कर भी रहा है तो उसे स्कूल में अन्य लोगों द्वारा मानसिक व मौखिक रूप से परेशान किया जाता है।
मेरा मानना है कि कम से कम अपने काम के प्रति तो व्यक्ति में ईमानदारी होनी ही चाहिए। इस पद पर सिर्फ उन्हीं लोगों को आना चाहिए जो पूरे उत्साह व लगन से बच्चों के उच्च भविष्य के लिए कार्य कर सकें व जिनमें बच्चों के लिए प्रेम व सदभाव की भावना के साथ ही समाज के प्रति एक जिम्मेदारी का एहसास भी हो।
दुर्भाग्य से आज समाज की नींव रखने वाले खुद ही जर्ज़र अवस्था में हैं तथा मानसिक रूप से पीड़ित हैं व अपनी ही तरह की खोखली,अज्ञानी व अशिक्षित पीढ़ी समाज को सौंप रहे हैं।
कुछ अपवादों को छोड़कर तथा इन सब बातों के बावजूद भी वो सभी अधिकारी, प्रधानाचार्य,अध्यापक व कर्मचारी प्रशंसा के पात्र हैं जो पूरी निष्ठा व ईमानदारी से अपने स्कूलों में कार्य कर रहे हैं तथा इस पद की गरिमा को बनाये रखें हैं व अपने कर्तव्य का पालन कर रहे हैं।