लिटरेट मीन्स एजुकेटेड - नो नो नो
इन दिनों हम ये सोच कर काफी प्रसन्न हो जाते हैं कि लड़कियाँ पढ़ाई-लिखाई कर रही हैं। आगे बढ़ रही हैं। सभी क्षेत्रों में काम करती दिखती हैं। लेकिन सच ये है कि लड़कियों को सिर्फ हम लिटरेट कर रहे हैं यानी पढ़ा-लि खा तो ज़रूर रहे हैं शिक्षित तो नहीं ही कर पा रहे हैं।
किताबें पढ़ कर, बढ़िया साफ़ सुथरी राइटिंग में लिख कर टॉप तो कर रही हैं और एक अदद नौकरी भी पा रही हैं लेकिन शिक्षित नहीं हो पा रहीं हैं।
शिक्षित यानी एजुकेटेड होने का मतलब है आत्मविश्वासी व आत्मवलम्बी होना।
आजकल महिलायें अपने पहनावे ,बोल-चाल,खाने-पीने,कमाने से लेकर अन्य अनेक प्रकार के मापदंडों से खुद को व दूसरों को शिक्षित होने का सुखद बहकावा दे रहीं हैं। लेकिन जब कोई निर्णय लेने का समय आता है तो किसी चमत्कार की आशा में अपनी परेशानी या समस्या को तब तक खींचतीं रहतीं हैं जब तक पानी सर के ऊपर से न निकल जाए और तब तक बहुत देर हो चुकी होती है।
मानसिक व शारीरिक रूप से प्रताड़ित होते रहना किसी के लिये भी शिक्षित होने की पहचान है...नहीं कतई भी नहीं।
अपने फर्ज़ तो महिलाओं को याद रहते हैं और याद न भी रहें तो परिवार,मित्र,आस-पास के लोग ये कहकर कि-"तुम अपना फर्ज़ निभाये जा"- याद दिला ही देते हैं।
फर्ज़ के साथ-साथ कुछ अधिकार भी मिले हैं महिलाओं को। बेटियों को उनके क्या-क्या फर्ज़ हैं बताने के साथ ही माता-पिता व समाज को उनके अधिकारों के बारे में भी शिक्षित करना चाहिये।
परिवार व समाज को अपने दरवाजे महिलाओं के लिए इतने तो खुले रखने ही चाहिये कि वो कम से कम बिना किसी खौफ के अपनी बात बता सकें।
अपने बिगड़ते रिश्ते को क्या सोच कर लटकाये जातीं हैं ? जीवन का उद्देश्य क्या है ?
शायद पुरुष से मिलने वाली बेमानी सुरक्षा और इसी सुरक्षा में ही सबसे ज्यादा असुरक्षा है।
समय रहते कोई ठोस निर्णय लें।

