उतार-चढ़ाव
आज कल "लेऑफ़" मतलब छंटनी शब्द प्रचलन में है। किसी भी नौकरी से निकलना और निकालना में सिर्फ एक मात्रा का अंतर है और ये एक मात्रा व्यक्ति की जिंदगी बदल देती है।
आज एक पोस्ट पढ़ी और जाना कि एक नामी कम्पनी ने अपने कर्मियों को केबिन में अचानक से बुलाकर सूचित या इन्फॉर्म किया कि अब आप हमारी कम्पनी के कर्मी नहीं हैं। इस प्रकार की सूचना पाकर लोग रो रहे थे तथा नौकरी से निकाल दिये जाने पर बहुत ही लाचार,विवश व ठगा सा महसूस कर रहे थे।
हम अपना जीवन,अपनी जवानी और जिंदगी का अमूल्य समय,अपनी सेहत,रिश्ते व परिवार के पैकेज के रूप में कुछ लाखों के पैकेज के बदले में इन नामचीन कम्पनीज को बड़े ही सस्ते में दे देते हैं । कम्पनी अपने मुताबिक़ हमारा मिसयूज़ करती है उसके बदले में रुपये हमारे मुहँ पर मारती है और हम अपने जीवन स्तर को सुधारने या समाज में अपना एक स्टेटस बनाने में इस रुपये को खर्च करते हैं। क्या करें बेहद मजबूर हैं हम ।
किसी भी बड़ी कम्पनी में रोजाना कितने ही कर्मी व्यक्तिगत या प्रोफेशनली कारणों से इस्तीफ़ा या रिजाइन करते हैं । खुदसे कम्पनी को छोड़ते हैं तब शायद ही कोई खबर आती है यानि जब आप खुद कम्पनी से निकल लेते हैं तो कोई जिक्र नहीं होता। कम्पनी क्या खुद को शर्मिंदा महसूस करती है ? नहीं।
वहीँ दूसरी तरफ जब कम्पनी आपकी ईमानदारी,कर्मठता,आपकी उच्च परफॉरमेंस,आपके द्वारा कम्पनी को दिलाये गए मोटे मुनाफे आदि को नजरअंदाज कर अचानक बिना कारण बताये रातों-रात आपको निकाल देती है तो पूरे विश्व में खबर फ़ैल जाती है। आप खुद को ठगा सा व शर्मिंदा महसूस करते हैं।
कम्पनी ज्वाइन करने पर जिस अभिमान से आप अपनी जोइनिंग की खबर सबको देते हैं वहीँ कम्पनी से निकाल दिए जाने पर आप इस बारे में खुलकर बात नहीं करते कि लोग क्या कहेंगे और आप डिप्रेशन में आ जाते हैं।कितनी ही रातें जाग कर मायूसी व नशे में बीतती हैं और कई लोग इस विश्वासघात को सहन नहीं कर पाते और गलत कदम उठा लेते हैं।
इस प्रकार के लेऑफ़ का कोई रीजन या कारण कर्मी को नहीं बताया जाता।
कड़वी सच्चाई है कि बहुधा इस तरह की प्रक्रिया में चाटुकार, मौन, चापलूस, जानपहचान वाले, अधिकारी के पसंदीदा व्यक्तित्व बच जाते हैं और दूसरे जो किस्मत से बच भी जाते हैं तो वो सभी इस डर से कि न जाने कब निकाल दिये जायें अनेक प्रकार के समझौते करते हुए डर के माहौल में काम करते हैं ।
निकाले गए बहुत सारे कर्मी बार-बार अपने नजदीकी से या स्वयं से दिन-रात पूछ रहे हैं कि मेरी परफॉरमेंस भी बढ़िया थी फिर मेरे साथ ऐसा क्यों हुआ ? जिसका उत्तर किसी के पास नहीं है।
इस प्रक्रिया से बचना है तो अपने स्वाभिमान को मारकर अपने व्यक्तित्व में बदलाव लाना होगा तथा अपने अधिकारी की गुड बुक्स में रहना व चाटुकारिता जैसे कुछ विशेष गुणों को सीखना होगा जो कि शायद आपके जैसे ईमानदार कर्मी के लिए करना कठिन हो।
वैसे दुनिया में बढ़िया काम करने वाले को काम की कभी कमी नहीं होती और यह भी सच है कि एक मेहनती, सच्चे आलोचक और ईमानदार कर्मी को कोई विरला ही अधिकारी,कम्पनी या मैनेजर अपने आस-पास रख या झेल पाता है क्योंकि ऐसा करने के लिये बहुत गट्स या हिम्मत चाहिये।
अतः निराश न होते हुए,अपने स्वाभिमान व जीवन मूल्यों से कोई भी समझौता न करते हुए, हिम्मत, ईमानदारी व स्वयं पर विशवास रखते हुए आगे बढ़ें और याद रखें कि कोशिश करने वालों की हार नहीं होती। यह सब जीवन का हिस्सा है। उतार-चढ़ाव हैं जीवन के जो हमें व्यावहारिक होने के साथ ही अनुभवी भी बनाते हैं।
