Thursday, June 25, 2020

आर्डर 

 "सुनो! मुझे नया फोन लेना है। काफी  टाइम हो गया अब इस फोन को। मैंने नया फोन ऑनलाइन आर्डर कर दिया है"-सुबह ऑफिस के लिए तैयार होते हुए मैंने समीर से कहा।
"हाँ हाँ ले लो भई। लिए बिना तुम मानोगी थोड़ी।वैसे इस फोन का क्या करोगी? इतना महँगा फोन है। बजट है इतना तुम्हारा कि तुम नया फोन अभी ले सको"-समीर ने हँसते हुए कहा।
"ये बेचकर ४-५ हज़ार और डालकर नया ले लूंगीं।तुमसे कोई पैसा नहीं  लूंगी। बेफिक्र रहो।अच्छा सुनो शाम को मुझे माँ की तरफ जाना है इसलिए आज थोड़ा लेट हो जाउंगी। तुम वहीँ से मुझे पिक कर लेना"-कह कर मैं जल्दी से घर से निकल ली।
ऑफिस से हाफ डे लेकर माँ के घर पहुँचीं। माँ के साथ खाना खा मैं बालकनी में आकर खड़ी हो गयी। माँ के यहाँ बालकनी से बहुत ही खूबसूरत नज़ारा देखने को मिलता था। चारों ओर हरियाली और चिडियों की चहचहाहट। तभी माँ भी चाय लेकर वहीं आ गयीं। चाय पीते-पीते दूर से एक बुजुर्ग से अंकल जी आते हुए दिखे। "माँ ये अंकल तो जाने-पहचाने से लग रहे हैं।देखो ज़रा कौन हैं।"
"अरे इन्हें नहीं पहचाना। गुड्डू के पापा ही तो हैं। गुड्डू तो अब विदेश चला गया न। ये यहीं नीचे वाले फ्लैट में अकेले रहते हैं। गुड्डू की माँ तो रही नहीं और  बहन भी कहीं बाहर ही रहती है"-माँ ने बताया।
गुड्डू और मैं बचपन में एक साथ खेलते हुए बड़े हुए थे। लेकिन मैं गुड्डू से ज्यादा नहीं बोलती थी।वैसे बहुत ही अच्छा लड़का था गुड्डू। सीधा-सादा ,होशियार।
"माँ मैं जरा मिलकर आती हूँ अंकल से"-कहकर मैं अपना बैग उठा कर नीचे अंकल के घर को चल पड़ी।
"ठीक है...पर बेटा जरा जल्दी आना"-माँ ने कहा।
दरवाजे पर घंटी बजायी। अंकल बाहर आये।
"नमस्ते अंकल।पहचाना?"
"आओ आओ बेटी। अच्छे से पहचाना बैठो। बहुत टाइम बाद देखा। कहाँ हो आजकल ?तुम्हारे मम्मी-पापा से तो  मुलाक़ात हो जाती है। बहुत ही अच्छे लोग हैं। खैर सुनाओ कैसे हैं सब तुम्हारे घर-परिवार में"-अंकल जी बहुत खुश थे मुझे देखकर और लगातार बोलते जा रहे थे।
"सब बढ़िया। आप बताइये। गुड्डू और दीदी कैसे हैं?"
"सब ठीक है बेटी। दोनों ही बाहर रहते हैं। आना तो कम ही होता है दोनों का।अब तो बस फोन पर ही बात होती है"-अंकल बहुत ही रुआँसी आवाज़ में बोले।
"क्या बात है अंकल जी सब ठीक है न ?"-मैंने पूछा।
"अब क्या बताऊँ बेटे कल रात फोन भी हाथ से छूट कर  गिर गया और खराब हो गया। मेरे हाथ में अपना फोन देते हुए अंकल जी बोले -जरा देखना ये ठीक हो सकता है क्या ? फोन के बिना मेरा गुजारा ही नहीं है। अब तो गुड्डू ही नया फोन भेजेगा।
"अरे अंकल जी गुड्डू की छोड़ें। फोन आने में तो बहुत टाइम लग जाएगा। तब तक आप परेशान थोड़े ही रहेंगें। ये लीजिये आपका फोन"-मैंने बैग से निकाल कर अपना फोन अंकल जी के हाथ में दिया।
"ये तो टच-स्क्रीन वाला है। बहुत महँगा होता है ये तो। नहीं-नहीं ये मैं नहीं ले सकता। मेरे लिए कोई पुराना सा फोन ही ला दो बेटे अगर ला सकती हो तो या इसी फोन को ठीक करवा कर दे देना। दो-चार दिन काम चला  लूंगा बिना फोन के"-अंकल जी बोले।
" मैंने आपकी सिम इसमें डाल दी है।  ये लीजिये आप चलाकर देखिये और आपका फोन ठीक कराने के लिए मैं ले जा रही हूँ। अब आप इस फोन को बेफिक्र हो कर इस्तेमाल करिये।" अंकल जी ने झिझकते हुए मेरा फोन अपने हाथ में लिया और ख़ुशी से चलाकर देखने लगे।फोन हाथ में ले बच्चों की तरह खुश थे वो।
"इसमें गेम्स वगैरह भी खेल सकते हैं न ? पर बेटे गुड्डू मुझे बहुत डाँटेगा। तुम रहने ही देतीं। मुझे मेरा फोन ठीक करवाकर दे देना"-अंकल जी थोड़ा घबराते हुए बोले।
"अंकल जी कभी-कभी गुड्डू की जगह मुझ गुड्डी को भी अपना बेटा समझ कर अपनी सेवा करने दिया करें"-मैंने हँसते हुए कहा।
"जीती रहो बेटी"-तुमने मेरी सारी  परेशानी ख़त्म कर दी"-अंकल जी ख़ुशी से बोले।
"अच्छा मैं चलती हूँ। माँ इंतज़ार कर रही होंगीं"-अंकल जी से बॉय बोल कर मैं एक अलग ही अंदाज से घर पहुंची। मन में एक अनजानी संतुष्टि सी थी।
       समीर शाम को लेने माँ के घर पहुंचे और बोले बड़ी खुश लग रही हो आज माँ से मिलकर।मैं बस मुस्कुरा कर रह गयी। घर पहुंच लैपटॉप ऑन करके नए फोन का आर्डर कैंसिल कर दिया।
     अंकल जी का फोन ठीक करवा कर अपने बैग में रख लिया। मन में एक ख़ुशी थी। नए फोन की अब मुझे कोई ऐसी चाह नहीं थी।