अम्मा
"क्या बुदबुदा रही हो सुबह-सुबह ?"
"कुछ नहीं। ये अम्मा सारा दिन घर के बाहर बैठी रहती है। कभी अंदर जाते नहीं देखा। पता नहीं रात को भी सोती है या नहीं। सब पर निगाह रखती है। सब पता होता है इन्हें किसके घर कौन आ रहा है कौन जा रहा है.मुझे तो जरा अच्छा नहीं लगता"-मैंने गैलरी में चाय पीते हुए अपने पति राज से कहा।
"अरे ये तो अच्छी बात है। मुफ्त का चौकीदार मिला हुआ है पूरे मोहल्ले को। इतनी बुजुर्ग हैं। अकेली रहती हैं। तुम लोगों को तो ख्याल रखना चाहिए इनका। इतनी बीमारी फैली है। कभी हाल-चाल ही पूछ लिया करो इनका "-राज ने कहा और अंदर चले गए।
मैं भी मुहँ बनाकर अंदर आ गयी। पता नहीं कोफ़्त सी होती थी अम्मा को देखकर।
एक दिन अचानक लॉकडाउन की खबर सुन सब मोहल्ले वाले जरूरी सामान लेने को दौड़े। अफरा-तफरी का माहौल था। रात तक सब लोगों ने सामान घरों में भर लिया था और निश्चिन्त थे आने वाले दिनों के लिए। अगले दिन से ही चारों और वीरानी छा गयी। कोई भी बाहर नहीं दिखता था।
घर में सब अपने परिवारों के साथ ही सिमट कर रह गए थे।
"अरे सीमा इधर आओ। तुम्हारे लिए खुशखबरी है जल्दी आओ "-गैलेरी में सुबह-सुबह चाय की चुस्की लेते हुए राज ने मुझे आवाज़ लगायी।
"क्या हुआ ?"- मैं भी अपनी चाय ले गैलरी में पहुंची।
"कुछ नोटिस किया तुमने ? देखो आज अम्मा नहीं है घर के बाहर"-राज बोले।
"अरे हाँ ये तो वाकई हैरानी की बात है "-मैंने हँसते हुए कहा।
खैर बात आयी-गयी हो गयी।
आज लॉकडाउन को पूरा एक महीना हो चुका था। सारा दिन घर के काम करके मैं भी थक जाती थी। लेकिन इस बार मैं पेंटिंग,राइटिंग,और कुकिंग आदि कर अपनी इच्छाओं को पूरा कर रही थी। धीरे-धीरे ये लॉकडाउन अच्छा लग रहा था। चारों ओर शान्ति थी। चिड़ियों की आवाज़ आती थी और हवा एकदम साफ़। मज़ा आ रहा था। एक सकूँ था जिंदगी में। वैसे इस बीमारी ने हमें काफी कुछ सिखा दिया था।
एक दिन दोपह का खाना खा हम लोग टी.वी देख रहे थे। तभी नीचे कुछ शोर सा सुना। भाग कर गैलेरी में गए हम दोनों तो एम्बुलेंस दिखाई दी। दो हेल्थ वर्कर्स और एक नर्स एम्बुलेंस से उतरते हुए दिखाई दिये ।
"हमारे मोहल्ले में किसे हो गया ये ?'-मैं घबराकर बोली।
तभी वो लोग फाटक खोलकर मोहल्ले में घुसे और आनन -फानन में मास्क लगा कर अम्मा जी के घर में घुस गए।
पूरा मोहल्ला अपने-अपने घरों से झाँक रहा था।
"लो अम्मा जी बीमार पड़ गयीं। उन्हें ही लेने आये हैं ये लोग"-मैंने बुड़बुड़ाते हुए कहा।
सामने वाली गैलेरी से मिसेज शर्मा बोलीं -"लो आ गयी मुसीबत।अब सब को यहाँ से जाना पड़ेगा"।
सब मोहल्ले वालों के चेहरों के रंग उड़ गए थे। सब की एक ही चिंता थी कि -अब क्या होगा ?
दस-पंद्रह मिनट में ही सबने न जाने क्या-क्या सोच लिया था।
तभी खटपट की आवाज़ें सुनाई दीं।
"अरे ये तो अम्मा के घर से आ रही है "-राज ने कहा।
"हाँ हाँ…तो क्या अम्मा "?-मैंने घबराते हुए राज का हाथ पकड़ लिया।
"अरे तुम तो एकदम ठंडी हो गयी हो। कुछ नहीं हुआ है। देखो वो लोग बाहर आ रहे हैं "-राज ने मुझे सांत्वना देते हुए कहा।
एक नर्स अम्मा का हाथ पकड़े घर से बाहर आयी और माइक लेकर बोली -"आप सभी को चिंता करने की आवश्यकता नहीं है। अम्मा जी ने अपना बहुत ध्यान रखा है। अस्सी की उम्र की होते हुए भी इन्होंने सभी बातों का पालन किया है। लेकिन जरूरी बात ये है कि अकेले होते हुए भी हमें फोन करके बुलाया अपनी जरुरतों की पूर्ति के लिए नहीं बल्कि अपने हाथ से सिले हुए करीब 100 मास्क दान में दिए हैं। आप सभी को इन पर गर्व होना चाहिए"।
इतना सुनते ही चारों ओर से तालियों की गड़गड़ाहट शुरू हुई और अम्मा ने हाथ जोड़ कर सबका धन्यवाद किया और चुपचाप अपने घर में चली गयीं।
मेरी आँखों से आँसू बहने लगे और पूरा मोहल्ला शर्म से गढ़ा जा रहा था ।