Monday, August 9, 2021

पैसे 


पैसे से हम- बंगला,गाड़ी, नौकर , खाना-पीना, सोना, कपड़ा, रिश्तेदारों में अकड़ ,शिक्षा ,समाज में नाम और कहें तो दुनिया के सारे सुख पा सकते हैं।

पैसा आने से - अपमान,पीड़ा,रोग,भूख,दर्द,आंसू, बिना कपड़े तन,बेआसरा,बदनामी,बेरोज़गारी,अनपढ़,निराशा आदि न जाने कितने शब्द छू मंतर हो जाते हैं।

 भारतीय संस्कृति में नेकी से की गयी कमाइयों की रोटी ही परिवार के मुँह लगती है। दूसरे की तकलीफ़ को अपना समझ कर भरपूर सहायता करने की कोशिश की जाती है।आदमी कितनी भी तंगी में हो पर पड़ोसी की सहायता के लिये एक कटोरी साग-सब्ज़ी और दो रोटी तो उसकी रसोई से निकल ही आती है। पहले तो सब कुछ रोटी से लेकर सुख-दुःख तक सब साँझे होते थे।

आज सबको पैसा चाहिये। पहले समय में बड़ों के आशीर्वाद से व्यवसाय चमक जाते थे या बच्चों की बड़ी नौकरी लगने पर खानदानों के रुतबे बदल जाते थे। 

आज लोग बदल रहे हैं। जल्दी पैसा कमाना है,किसी भी प्रकार से पाना है,कहीं से भी कमाना है क्योंकि रोटी ज्यादातर अब घर की रसोई से कम बाज़ार के किचन से ही सब के मुँह में जा रही है तो कमाई भी कैसी भी हो कोई फ़र्क नहीं पड़ता।अब आदमी बड़ा आदमी खुद के बलबूते पर बन रहा है तो आशीर्वाद व दुआओं जैसे शब्द भी बेमानी हो गये हैं। आत्मा मर रही है। चीजों की चमक-दमक में अपनों  के चेहरों की चमक फीकी पड़ गयी है। 

आज इस आपदा के समय बहुत से लोग अपनी जान व परिवारों को दांव पर लगा कर अपने कर्तव्य का पालन बड़ी हिम्मत से कर रहे हैं तो वहीं कुछ अपनी आत्मा को मारकर नोटों की गागर से अपने लोटे नोटों से भर रहे हैं और बड़ी ही शान से अपनी इस कमाई को दुनिया को दिखाने के चक्कर में हैं। 

आप के पास कोई भी हुनर है या आप किसी भी पेशे से हों यानि आप समाज में डॉक्टर, इनजीनियर, अध्यापक या कोई भी बड़े व्यवसायी बनें और पैसा,रुतबा,मान खूब अर्जित करें लेकिन ईमानदारी,दया, कर्तव्य -परायणता आदि गुणों को ताक पर नहीं धरें। इन गुणों के साथ-साथ पैसा व नाम दोनों कमायें।

हमारी संस्कृति, माता-पिता द्वारा मिले संस्कार निश्चित ही इतने पिदने तो नहीं कि इस माया के सामने हम इन्हें भूल जायें। आत्म-चिन्तन करें।  किसी के कठिन समय में अपना लाभ बनाने या किसी भी लालच में फँसने से पहले एक बार अवश्य सोचें कि आप स्वयं को भी निकट भविष्य में ऐसी ही परिस्थिति या विपदा में खड़ा पा सकते हैं।

पैसे से दुनिया के सारे ऐशो-आराम सिर्फ आपकी देह को प्राप्त हैं। जीवन को सकून और आराम तो पर-सेवा व निःस्वार्थ भावना से ही मिलता है।