Friday, September 22, 2023

टीकू की करनी

मेरे द्वारा लिखित कहानी " टीकू की करनी "  दिल्ली प्रेस द्वारा प्रकाशित हिन्दी पत्रिका सरिता के 22 सितम्बर २०२३ के अंक में प्रकाशित ।

https://www.sarita.in/story/family-stories/tiku-ki-karni


                                                      टीकू की करनी 

14  साल की बीना एक बहुत ही सुलझी और समझदार लड़की थी। एक गरीब परिवार में जन्म हुआ और अपने माँ-बाबा और बड़े भाई टीकू के साथ शहर के कोने में बसी एक छोटी सी झुग्गी में रहती थी। बीना के बाबा और भाई टीकू कोई काम नहीं करते। बीना अपनी माँ के साथ घरों में साफ़-सफाई का काम कर कुछ पैसे कमा लाती और जैसे-तैसे घर का गुजारा होता। माँ टीकू को काम करने के लिए बहुत समझाती पर उसके कानों में जूँ तक न रेंगती। सारा दिन झुग्गी के आवारा लड़कों के साथ टाइम पास करके रात को घर आकर माँ पर धौंस जमाता। बाबा का तो महीनों कुछ पता ही नहीं रहता था।  

झुग्गी के पीछे की तरफ सरकारी फ्लैट्स बने थे। उन्हीं  फ्लैट्स में रहने वाली अनीता के यहाँ  बीना काम करने जाती थी। काम करने के बाद बीना अनीता की छोटी बेटी नीला के साथ थोड़ी बहुत बात-चीत करती और उससे नयी-नयी बातें सीखती। नीला को देख कर बीना का मन भी पढ़ने के लिये करता था। वह भी दूसरी लड़कियों की तरह हँसी ख़ुशी रहना चाहती थी। पढ़-लिख कर अपनी माँ के लिए कुछ करना चाहती थी पर घर के हालात और गरीबी इन सब के बीच में सबसे बड़ा रोड़ा थी। 

अनीता का घर छोटा सा ही था। घर में रसोई,बाथरूम और दो ही कमरे थे। पूरा घर साफ़-सुथरा और करीने से सजा था। एक बालकनी थी जिसमें अनीता ने गमले लगा रखे थे। इन गमलों में छोटे-छोटे पौधे थे। दो-चार कटोरों में चिड़ियों के लिए दाना-पानी रखा था। चिड़िया भी बड़े ही मजे से इन कटोरों से चुगने आतीं और पानी पीतीं। बालकनी की दीवार पर अनीता की बेटी नीला के हाथ की बनी दो-चार पेंटिंग्स लगीं थीं।  

बीना अनीता  के घर का सारा काम निबटा कर थोड़ी देर के लिए बालकनी में पड़ी कुर्सी पर बैठ कुछ वक्त बिताती। यहाँ उसे बड़ा ही सकूँ मिलता। बालकनी में बैठ बीना भी सोचती काश मेरा घर भी ऐसे ही होता और वो  भी अपने घर में ये सब गमले और पौधे लगा पाती। 

तभी अनीता ने बीना को आवाज लगाई और उसे एक थैला देते हुये कहा -"बीना इस थैले में चादर,दरी,चुन्नी और कुछ घर का सामान है ले जाना कुछ काम आये तो रख लेना नहीं तो झुग्गी में बाँट देना और हाँ काम हो गया हो तो अब तुम  जाओ मुझे भी अब आराम करना है।" 

"हाँ हाँ आंटी मैं जा रही हूँ। आप दरवाजा बंद कर लो।"- अनीता के हाथ से सामान का थैला ले बीना घर की ओर चल दी। 

घर पहुँचते -पहुँचते शाम के पांच गए थे। माँ अभी तक घर नहीं आयी थी। बीना ने माँ के आने तक रात के खाने की तैयारी कर ली। माँ ने आकर रोटी बनायीं। बीना और  माँ ने  खाना खाया और माँ जल्दी ही सो गयीं और बीना भी झुग्गी के बाहर लगी लाइट की रोशनी में नीला से लायी किताब के रंगीन चित्र देखते हुये जमीन पर बिछी फटी-पुरानी दरी पर ही सो गयी। 

सुबह उठ कर बीना ने माँ से कहा - "माँ आज मैं काम पर नहीं जाउंगी। तबियत ठीक नहीं है। आज कुछ आराम करूँगी"। 

"ठीक है बीना। जैसी तेरी मर्ज़ी"-कह कर माँ काम पर चली गयी।  

माँ के जाने के बाद बीना ने अपने लिये चाय बनायी और डिब्बे में पड़ी रात की बची रोटी खा कर जमीन पर बिछी दरी पर लेट गयी। लेटे हुये छत तकते हुये अचानक उठी और अनीता का दिया थैला खोला और उसमें से सारा सामान बाहर निकाला। 

बीना ने घर पर पड़े पुराने संदूक को कमरे में एक कोने में लगाया और उस पर घर में फैले पड़े  चादर,तकिये लपेट कर रखे। बीना ने अनीता की दी हुई चादर करीने से संदूक पर बिछा दी। झोले दीवार पर टांग दिये।कमरे को अच्छे से  साफ़ कर बीना ने अनीता की दी हुई पुरानी दरी जमीन पर बिछा दी। कोने में पड़ी पुरानी सी चौकी पर अनीता की दी हुई चुन्नी बिछायी और चौकी को संदूक केआगे टेबल की तरह दरी पर रख दिया। थैले से निकली एक पुरानी सी पेंटिंग को दीवार पर टांग दिया। कमरे में फैला सारा सामान करीने से रख दिया ।

बस इतना करने से ही बीना का कमरा सुन्दर लगने लगा और वह मन ही मन बहुत खुश हो गयी। तभी पड़ोस की लता आंटी बीना के कमरे में आयी और चौंकती हुयी बोली -"अरे बीना ये तेरा ही कमरा है क्या ? बहुत साफ़ और सुन्दर लग रहा है भई।"

"हाँ हाँ। मेरा ही कमरा है।बस थोड़ा ठीक ठाक किया है "-बीना ने ख़ुशी से कहा। 

शाम को माँ काम से लौटीं तो कमरे की हालत देख ख़ुश हो गयी और बीना को आवाज़ लगायी -"अरे बीना तूने तो बहुत ही सुन्दर कर दिया कमरा बिलकुल फ्लैटों जैसा।  इसीलिये आज काम से छुट्टी की थी तूने"। 

"हाँ माँ मेरा मन भी करता है कि मैं भी अपने घर को सुन्दर रखूँ। वो फ्लैट वाली नीला की मम्मी अनीता आंटी ने कुछ सामान दिया था बस उस से ही थोड़ा सा ठीक-ठाक किया है " - बीना ने माँ का हाथ पकड़ते हुये कहा। 

"हाँ मन तो मेरा भी करता है पर तू तो जानती ही है इन सब के लिए पैसा और वक्त दोनों चाहिये। वक्त तो निकाल भी लो पर पैसे ? पर जो भी है बीना आज कमरे में अच्छा लग रहा है"- माँ ने ख़ुशी  से कहा।

रात को टीकू  कमरे में आया और आँखे फाड़ कर कमरे के बदले रूप रंग को देखता रहा और बोला -"भई ये  कमरा अपना ही है ? किसने किया है ये सब ? 

"मैंने किया है। कोई दिक्कत ?"-बीना ने कहा। 

"अरे!नहीं-नहीं।एक नंबर का चका चक लग रहा है। अमीरों वाली फीलिंगआ रही है। अरे ! हाँ अम्माँ मैं सुबह दस-पंद्रह दिनों के लिये अपने दोस्तों के साथ कहीं जा रहा हूँ। मुझे अब नींद भी आ रही है जल्दी से कुछ खाने को दे दे "-टीकू बोला।  

टीकू सुबह दोस्तों के साथ निकल लिया और बाबा का तो कई महीनों से कुछ पता ही न था। 

 बीना भी माँ के साथ सुबह काम पर निकल गयी और अनीता के फ्लैट पर पहुँची। अनीता बालकनी में लगे पौधों की काट छांट कर रही थी और गमलों में से कई पौधों की कटिंग फेंक दी थी। 

"आंटी ये कटिंग्स मैं ले लूँ ? "

 "तुम इनका क्या करोगी ? "

"मैं भी इन्हें अपने कमरे के बाहर मिट्टी में लगा लूँगी। मेरा बहुत मन करता है पौधे लगाने का। "

"अच्छा तो ये दो-चार गमले भी ले जा। वैसे भी मुझे बदलने हैं ये। "

"ठीक है आंटी। शाम को काम से लौटते हुये मैं ले जाऊँगी "-बीना ने चहकते हुये कहा।  

अनीता के घर से शाम को गमले और पौधों की कटिंग्स ले कर बीना झुग्गी पहुँची। गमलों  में कटिंग्स लगाकर  गमले झुग्गी के बाहर रख दिये। 

पौधे गमलों में कई दिन तक यूँ ही मुरझाये पड़े रहे। बीना रोजाना काम पर आते-जाते गमलों को देखती और उदास हो जाती और सोचती-"मैं तो पानी भी डालती हूँ गमलों में फिर पौधे मर क्यों गये ? क्या गरीबों के यहाँ पौधे भी नहीं होते ?

कई दिनों तक गमले ऐसे ही पड़े रहे। बीना भी ना उम्मीद हो चुकी थी।शाम को काम से झुग्गी पहुंची तो गमले में मनीप्लांट की छोटी सी पत्ती उगती दिखी। बीना की ख़ुशी का कोई ठिकाना न था। कुछ ही महीनों में मनीप्लांट की बेल बीना की झुग्गी के दरवाजे के ऊपर फैल गयी।अब बीना की झुग्गी दूर से ही दिख जाती। पौधों और मनीप्लांट के कारण पूरी बस्ती में बीना की झुग्गी की अलग ही पहचान बन गयी थी। बीना को लगता जैसे वो भी अनीता जैसे ही फ्लैट में रह रही हो। बीना को अपनी झुग्गी फ्लैटों से भी अच्छी लगने लगी। काम ख़त्म कर वो जल्दी अपने घर पहुँचने की करती और बड़े ही चाव से अपने कमरे को सजाती,पौधों में पानी डालती,कमरे की ड्योढ़ी पर बैठ पौधों से बातें करती। बीना की ख़ुशी उसके चेहरे से साफ़ झलकती थी। बीना की आस-पड़ोस की सहेलियाँ भी गमलों के पास आ बैठतीं और सब खूब बतियातीं। 

शाम को काम से वापिस आकर बीना और उसकी माँ खाना खा रही थीं। तभी बाहर खूब शोर होने लगा। माँ ने बाहर जा कर देखा तो चारों ओर पुलिस ही पुलिस थी। 

पड़ोस की लता आंटी से बीना ने पूछा -"ये क्या हो रहा है ?"

"कुछ लड़कों को ढूँढ रहे हैं ये पुलिस वाले। सामने वाले मोहल्ले में पत्थर बाजी की है उन लड़कों ने।अब ये हर झुग्गी की तलाशी ले रहे हैं "-लता आंटी ने कहा। 

पूरी रात झुग्गी में तलाशी चलती रही। 

सुबह बीना माँ के साथ काम के लिये निकल गयी। दोपहर के करीब माँ बीना के पास घबराती हुई अनीता के फ्लैट पर उसे लेने पहुँची। 

डोर बैल बजने पर अनीता ने दरवाजा खोला। सामने बीना की माँ खड़ी थी। 

"क्या हुआ ? इतनी घबराई हुई क्यों हो तुम ?"- अनीता ने बीना की माँ से पूछा। 

"तुम बीना को भेज दो मेरे साथ। झुग्गी में पुलिस आयी हुई है और तलाशी ले रहे हैं। पड़ोसन ने मुझे बताया है पुलिस वाले मेरी झुग्गी की तलाशी लेने के लिये मेरा इंतज़ार कर रहे हैं। बस जल्दी से बीना को भेजो"-बीना की माँ ने एक ही साँस में सारी  बात अनीता को बतायी। 

"चलो चलो माँ "-बीना माँ का हाथ पकड़ फ्लैट से अपनी झुग्गी की ओर दौड़ पड़ी। 

बस्ती में दूर से ही पुलिस वाले नजर आ रहे थे। बस्ती के अंदर बीना की झुग्गी के आस-पास लोगों की भीड़ लगी थी 

बीना और माँ के पहुँचते ही एक पुलिस वाले ने बीना की माँ को अपनी ओर बुलाया और पूछा -"हाँ अम्माँ ! ये फोटो देखो और बताओ इसे जानती हो तुम ?

"हाँ हाँ ! ये तो मेरा लड़का टीकू है "-माँ ने कहा। 

"तुम्हारा लड़का सामने मोहल्ले में हुई पत्थर बाजी में शामिल था।करोड़ों का नुक्सान हुआ है। हमारे पास आर्डर हैं। पत्थर बाजी में शामिल  सभी लड़कों की झुग्गी पर बुलडोजर चलेगा आज। अपना कोई सामान है तो निकाल लो झुग्गी में से "-पुलिस वाले ने कड़कती आवाज में कहा। 

ये सब सुनते ही बीना और उसकी माँ के होश उड़ गये। 

भीड़ को तितर-बितर कर पुलिस वाले ने बीना की झुग्गी पर बुलडोजर चलाने का हुक्म दिया। माँ के कंधे पर सर रख बीना दहाड़ें मार चीखती रही पर किसी ने उस पर ध्यान नहीं दिया। बीना की आँखों के सामने मिनटों में ही उसकी झुग्गी,गमले,मनीप्लांट सब मिट्टी में मिल गये। मलबे में चादर,चुन्नी दबे दिख रहे थे। बीना ये सब देख जमीन पर बेहोश हो कर गिर पड़ी। माँ बीना को गोद में लिये वहीं जमीन पर बैठ गयी।  

बीना की फ्लैट जैसी झुग्गी का दूर-दूर तक अता-पता न था। टीकू की करनी ने बीना से उसका झुग्गी वाला फ्लैट छीन लिया था।