Friday, May 19, 2023

मेरे द्वारा लिखित कहानी “ बड़ा मकान “  दिल्ली प्रेस द्वारा प्रकाशित हिन्दी पत्रिका सरिता के मई २०२३ के अंक में प्रकाशित ।


https://www.sarita.in/story/family-stories/bda-makaan



बड़ा मकान 

गर्मी की छुट्टियों में मैं मम्मी के साथ अपनी मासी के घर जब भी दिल्ली जाती तो रास्ते में बड़े-बड़े मकान दिखाई देते। शीशे की खिड़कियों पर डले  परदे और बालकनी में लगे झूले,कुर्सियां,पौधे, हैंगिंग लाइट और बड़े-बड़े सुन्दर से मेन गेट और बाहर खड़े गार्ड्स और चमकती हुई गाड़ियां दिखती थीं। 

मैं हमेशा सोचती कि इन मकानों में लोग अंदर कैसे रहते होंगे ? इन मकानों को बस फिल्मों में ही देखा था और वैसी ही कल्पना की थी।पता नहीं एक उत्सुकता सी थी हमेशा इन बड़े मकानों को अंदर से देखने की। 

हमारे घर के सामने रहने वाले गुप्ता अंकल जी ने अपना घर बेच दिया और रातों रात ही घर को ढहा दिया गया। अब मलबा ही मलबा था चारों ओर। दो-चार दिन बाद ही मलबा उठाने के लिए मजदूर भी आ गये दस दिन में ही पाँच सौ गज का प्लॉट दिखाई देने लगा। 

मैं रोजाना अपने स्कूल से आकर कमरे की खिड़की से मजदूरों को काम करते देखती। जब मम्मी खाने के लिये आवाज लगातीं तभी मैं खिड़की से हटती। 

एक दिन स्कूल से आकर मैंने देखा कि प्लॉट पर बहुत गहमा-गहमी है। कई लोग सर पर कैप लगाये दिखाई दिये जो  इंचटेप से जमीन माप रहे  थे। मम्मी ने बताया कि ये कैप लगाये लोग इंजीनियर हैं जो घर का डिज़ाइन बनायेंगें। किन्हीं अरोड़ा साहब ने ये घर खरीदा है और अब यहाँ बड़ा सा महलनुमा घर बनेगा। 

मैं सुनकर बड़ी खुश हो गयी और सोचने लगी कि अब तो शायद मैं ये बड़ा सा मकान अंदर से देख पाऊँ। कभी तो कोई मौका मिलेगा अंदर जाने का।  

अब तो बड़े ही जोर-शोर से काम चलने लगा। बहुत शोर रहने लगा अब हमारे घर के अंदर तक आवाजें आती थीं। ईंटें, सीमेंट,लोहे के सरिये, मशीनें चलतीं रहतीं ,मजदूर जोर-जोर से बातें करते यानी खूब चहल-पहल रहती थी रात तक। 

करीब 2 साल तक काम चला और मम्मी ने जैसा कहा था वैसा ही महलनुमा सुन्दर सा मकान तैयार हुआ। 

आज मेरी स्कूल की छुट्टी थी और मैंने देखा कि इस मकान के बाहर बड़ा सा शामियाना लगा था और पूरा घर शामियाने से चारों ओर से ढका हुआ था। 

मैं दौड़कर मम्मी के पास गयी तो पापा को मम्मी से बात करते सुना कि- आज अरोड़ा साहब के मकान का महूर्त है। तभी ये शामियाना लगा है। 

तब मैंने उछलते हुआ पापा को टोका और पूछा - " फिर तो हम भी जायेंगे न आखिर पड़ोसी हैं हम  इनके"। 

पापा मुस्कुराए और बोले - "अरे नहीं बेटा हमें नहीं बुलाया है उन्होंने। हमें तो जानते भी नहीं हैं ये लोग"। 

सुनकर मैं उदास हो गयी और मन ही मन कल्पना करने लगी कि कैसे इस घर के लोग पार्टी करेंगें,घर अंदर से कैसा होगा ? सब मजे कर रहे होंगें। बच्चे भागम भाग कर रहे होंगे। इतना बड़ा मकान है ये। काश ये अरोड़ा अंकल हमें भी बुला लेते...   

मैं खिड़की के पास आकर खड़ी हो गयी और हसरत भरी निगाहों से मकान की तरफ देखने लगी। 

रात हो चली थी। बस लाइटें ही लाइटें थीं मकान की मंजिलों और शामियाने में और खूब तेज म्यूजिक बज रहा था। कुछ ज्यादा दिख नहीं पा रहा था कि अंदर क्या चल रहा है। दूर तक गाड़ियां दिख रही थीं। मेहमान खूबसूरत कपड़ों में अंदर जाते दिख रहे थे।

मम्मी ने मुझे खाना खाने को बुलाया पर मेरा मन तो अरोड़ा अंकल  के मकान के अंदर जाने को मचल रहा था।आज अपना फेवरट खाना भी अच्छा नहीं लगा मुझे। रात भर सामने पार्टी चलती रही। 

मम्मी-पापाऔर मैं सो गये। 

सुबह मैं तैयार होकर स्कूल चली गयी। वापिस आकर खिड़की से मकान  देखने लगी। मकान बाहर से सुन्दर था पर घर में कोई दिखाई नहीं देता था। बस गाड़ी आती जाती दिखतीं थीं कभी-कभी। ज्यादातर बड़ा सा गेट बंद ही रहता था। 

इस मकान  को देखते-देखते अब मेरा मन भी उकता गया था । मैं अब अपना समय अपनी पढ़ाई में  देने लगी। 

इस मकान में अरोड़ा अंकल को आये पाँच -छह साल हो गये थे। मैं आज जब कॉलेज से वापिस आ रही थी तो अरोड़ा अंकल जी के घर पर लाइटें लगी देखीं। रात को पापा ने बताया कि अगले महीने अरोड़ा अंकल के बेटे की शादी है। सुना है बड़े ही अमीर घर से बहू आ रही है। 

"तो अभी से इतनी लाइटें क्यों लगा दीं "- मैंने पूछा। 

"पूरे महीने फंक्शन्स होंगें इनके यहाँ "- मम्मी बोलीं। 

"पर हमें क्या ? हमें कौन सा बुलाएंगें"- मैंने चिढ़ते हुए कहा। 

एक महीना यूं ही निकल गया। बैंड बजने लगे। शहर के सभी अमीर लोग घर के बाहर इकट्ठे थे। घुड़चढ़ी हो रही थी। घर की सजावट से लेकर मेहमानों और अरोड़ा अंकल-आंटी जी के कपड़े सब देखने लायक था। बारात चली गयी और चमकते हुए घर में शान्ति पसर गयी। 

सुबह 4 बजे बैंड -बाजा सुनाई दिया। मम्मी और मैं आँखें मलते हुए खिड़की पर पहुँचे। डोली आ गयी थी। लम्बी सी चमकती हुई गाड़ी रुकी और परी जैसी बहू उतरी। अरोड़ा आंटी अपने सभी रिश्तेदारों और मेहमानों के साथ अपने बहू-बेटे को बड़े से गेट के अंदर ले गयीं और गेट बंद हो गया। चारों ओर चुप्पी फ़ैल गयी और मम्मी वापिस जा कर सो गयीं। 

मैं अपने बेड पर लेटे हुए सोचने लगी कि अंदर कैसे सब बहू पर वारि-वारि जा रहे होंगे। ढेरों गिफ्ट मिले होंगे बहू को। महल की रानी बनके रहेगी ये तो। क्या किस्मत है इस लड़की की। नौकर-चाकर आगे पीछे घूमेंगे इसके।गाड़ी -बंगला,पैसा,शानो शौकत और क्या चाहिये एक लड़की को। इतना सुन्दर और बड़ा घर... यानि जो भी फिल्मों में देखा था उसी की कल्पना करते और ये सब सोचते-सोचते मैं सो गयी। 

कई दिन तक सामने गाड़ियाँ आती-जाती रहीं।

कई दिन बाद  बाजार में अचानक से हमें सामने वाली गुप्ता आंटी मिलीं। हाल-चाल पूछने के बाद बोलीं - "हमारे जाने के बाद अब तो अरोड़ा जी बन गये हैं आपके पड़ोसी?  पिछले साल शादी थी उनके बेटे की आप लोग भी गये होंगे" ?

"नहीं-नहीं आंटी हम कहाँ गये थे।  हमें थोड़ी बुलाया था और हमसे तो वो लोग आज तक बोले भी नहीं। बस गाड़ी आती-जाती दिखती हैं फिर गेट बंद"- मैंने तपाक से जवाब दिया।  

"ओह ! वैसे मैं  भी शादी में तो जा नहीं पायी थी बस थोड़ी देर के लिये ही इनके घर गयी थी बहू की मुहँ दिखाई के लिये। बड़े ही अमीर घर से बहू लाये हैं अरोड़ा साहब और ऊपर से इतनी सुन्दर,सुशील और खूब पढ़ी-लिखी। इनके पूरे परिवार में कोई भी इतना पढ़ा-लिखा नहीं है।बस क्या ही बताऊँ किस्मत खुल गयी इन लोगों की तो। वैसे हमने भी अपनी बेटी शिखा का रिश्ता तय कर दिया है अगले महीने ही शादी है। आप सब को भी आना है। शादी का कार्ड देने आउंगी मैं भी " - गुप्ता आंटी खुश होते हुए बोलीं। 

"हाँ हाँ जरूर आइयेगा।ये तो बड़ी ख़ुशी की बात है।अब चलते हैं काफी देर हो गयी है।आप भाई साहब के साथ आइयेगा हमारे घर। उनसे मिले भी काफी समय हो गया है "- मम्मी ने गुप्ता आंटी से कह कर विदा ली और हम बाजार में आगे निकल गये।

थोड़े दिन बाद ही गुप्ता आंटी हमारे घर अपनी बेटी शिखा की शादी का कार्ड देने आयीं। मम्मी को मुझे और पापा को साथ लाने का कह जल्दी ही चली गयीं। 

मैं पापा-मम्मी के साथ शिखा की शादी में पहुंची। दूर से ही  हॉल में गुप्ता आंटी ने स्टेज से हमें देखा और अपनी ओर आने का इशारा किया। हम तीनों गुप्ता आंटी के पास पहुँचे तभी आंटी ने कीमती से लहंगे में पास ही खड़ी खूबसूरत सी लड़की  को नज़दीक बुलाया और मेरी तरफ देखते हुए बोलीं - "निया बेटे इससे मिलो ये शीनू है। तुम्हें एक बार देखना चाहती थी और तुम्हारे घर के सामने वाले घर में ही रहती है और शीनू ये निया है अरोड़ा अंकल की बहू। "

"अच्छा सच में " - निया ने कहा। 

मेरे कुछ कहने से पहले ही निया ने मुझे गले लगा लिया।  

"आप तो बहुत ही प्यारी हो शीनू। आओ न कभी हमारे घर। खूब बातें करेंगें " - निया ने कहा। 

"हाँ हाँ भाभी। ज़रूर। जल्दी ही आती हूँ आपके यहाँ।आप अपना मोबाइल नंबर दे दें "- मैंने कहा। 

घर वापिस आकर मैं तो उछल रही थी। मेरी तो ख़ुशी का कोई ठिकाना न था। मेरा तो मानो कोई सपना सच हो गया। अब तो मैं बड़े आराम से उस मकान में अंदर जा सकती हूँ और अगर निया भाभी मेरी दोस्त बन गयीं तो फिर तो मजा ही आ जाएगा। मैं रोज इस बड़े से मकान में जा पाउंगी। 

"अरे शादी से आकर बड़ी ही खुश नजर आ रही हो तुम। क्या बात है ? कपड़े बदल लो और सो जाओ सुबह कॉलेज भी जाना है। एग्जाम्स भी हैं तुम्हारे "- माँ ने कमरे में मुझे कॉफ़ी पकड़ाते हुए कहा।

झटपट दिन बीत गये और एग्जाम्स भी नजदीक आ गये। मेरा सारा टाइम कॉलेज और पढ़ाई में ही बीतने लगा। खिड़की से अरोड़ा अंकल का मकान देखे तो बहुत समय हो गया था।  

आज मेरा आखिरी पेपर था। कॉलेज से वापिस आते समय मैं सोच रही थी कि कल फ्री होकर कुछ अच्छा सा गिफ्ट ले कर निया भाभी से मिलने जाऊँगी। 

आते ही मैंने मम्मी से पूछा - "मम्मा कल मैं निया भाभी से मिलने सामने चली जाऊँ ?"

"चली जाना। एक बार पापा से भी फोन करके पूछ लो। सुबह ही भोपाल के लिए निकल गए हैं और अब एक हफ्ते बाद आयेंगें। तुम्हारे पेपर का भी पूछ रहे थे। वैसे पेपर कैसा हुआ तुम्हारा ? जाने से पहले एक बार फोन भी कर लेना निया को।अच्छी लड़की है निया। कोई एटीट्यूड नहीं था लड़की में " - मम्मा ने कहा। 

"पेपर तो बहुत अच्छा हुआ है मम्मा। फिकर नॉट। अभी पापा को बताती हूँ और हाँ फोन कर के ही जाऊँगी निया भाभी के घर "- मैंने हँसते हुए कहा। 

कल मैं इस बड़े से मकान को अंदर से देख पाऊंगीं। यही सोच-सोच कर मैं बहुत ही खुश थी।  

सुबह सवेरे गाड़ी के हॉर्न्स से मेरी नींद खुली। मम्मी घर में दिखाई नहीं दीं। मैं भागकर अंदर खिड़की पर गयी। जा कर देखा तो अरोड़ा अंकल जी के मकान के बाहर चार-पाँच पुलिस की गाड़ियाँ खड़ी थीं। भीड़ ही भीड़ थी सामने। मीडिया की गाड़ियाँ और शोर ही शोर था।

तभी मम्मी ने मुझे आवाज लगायी। 

"आप कहाँ थीं मम्मा ? क्या हुआ है नीचे ? ये पुलिस क्यों आयी है ? क्या हुआ है अरोड़ा अंकल जी के घर ?" - मैंने पूछा। 

"बेटे निया भाभी नहीं रहीं। पता नहीं कैसे-कैसे लोग हैं दुनिया  में ? नीचे सब बता रहे हैं कि बहुत तंग करते थे ससुराल वाले उस लड़की को। इतना दहेज़ लायी थी, पढ़ी लिखी थी, सुन्दर थी फिर भी उसे दहेज़  के लिये मारते-पीटते थे। अरोड़ा अंकल के बेटे को निया पसंद नहीं  थी और पता चला है कि वो पहले से ही शादीशुदा था। संतान न होने का ताना देते थे। मतलब हर तरह से परेशान थी वो और आज उसने अपनी जान ही ले ली "- मम्मी ने सुबकते हुए बताया।  

मेरी आँखों से आँसू  बह रहे थे। मुझे निया भाभी याद आ रहीं थीं। मैंने अपने मोबाइल पर उनकी डी.पी. देखी।विश्वास ही नहीं हो रहा था कि प्यारी सी,खूबसूरत सी लड़की अब दुनिया में नहीं थी। 

बड़े से मकान को अंदर से देखने का मेरा चाव एक झटके में ही ख़त्म हो गया। बड़ा मकान नहीं हमारी सोच होनी चाहिये। हमारा दिल बड़ा होना चाहिये। इतनी चक-मक के पीछे कितना अन्धकार है। 

 निया भाभी के लिये लाये गिफ्ट को टेबल पर रख मैंने खिड़की को बंद कर दिया। 


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